Sunday, January 23, 2022

कार्तिकेय पुर राजवंश

                 कार्तिकेयपुर राजवंश
उत्तराखंड के इतिहास का पहला ऐतिहासिक राजवंश इसे ही माना जाता है इसका समयावधि लगभग 700 ई. से 1100 ई. का माना जाता है! इस वंश के अंतर्गत तीन परिवार आते थे! जिसमें 14 राजाओं ने शासन किया था! 
प्रथम परिवार (बसंत देव राजवंश) 
द्वितीय परिवार (निम्बर देव राजवंश) 
तृतीय परिवहन (सलोणादित्य राजवंश) 

कार्तिकेयपुर राजवंश का मूल स्थान- इतिहासकार लक्ष्मीधर जोशी और बद्री दत्त पांडे के अनुसार यह अयोध्या के सूर्यवंशी थे! उत्तराखंड में मूल कार्तिकेय पुर का स्थान जोशीमठ चमोली माना जाता है किंतु तो यह भी संभव है कि कार्तिकेयपुर  मूल रूप से वर्तमान कार्तिकेय मंदिर क्षेत्र रुद्रप्रयाग भी हो सकता है कार्तिकेयपुर राज्य इष्ट देवता कार्तिकेय स्वामी थे ताम्रपत्र से स्पष्ट होता है कि  कत्युरी शासकों की राजभाषा संस्कृति तथा लोकभाषा संभवत प्राकृति थी! 

प्रथम शाखा  (बसंतदेव राजवंश)-
1- बसंतदेव- यह कन्नौज के राजा यशोवर्मन का सामंत था! जो ललितादित्य मुक्तापीड के आक्रमण के बाद स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर देता है और बसंत देव राजवंश की स्थापना करते हैं  इतने जोशीमठ के पास कार्तिकेयपूर को अपनी राजधानी बनाया इस वंश की जानकारी बागेश्वर शिलालेख से मिलती है बागेश्वर से प्राप्त त्रिभुवन राज के शिलालेख से पता चलता है कि इस वंश का संस्थापक बसंत देव था
बागेश्वर अभिलेख से यह पता चलता है कि बसंत देव ने शरणेश्वर ग्राम में वैष्णवों को भूमि दान दी थी इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी और जोशीमठ में नरसिंह मंदिर व बागेश्वर के मंदिरों का निर्माण करें बागेश्वर अभिलेख  मैं इसकी पत्नी का नाम सज्यनारा मिलता है यह शैव धर्म को मानता था! 
Note- कुछ किताबों में बसंत देव की पत्नी राज नारायणी देवी उत्तीर्ण है! 
बसंत देव के बाद के राजा का नाम वर्णन नहीं है उसके बाद खर्परदेव का नाम आता है! 
2- खर्परदेव- इसकी पत्नी का नाम कल्याणी देवी था इसने भी परमभट्ठारक महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी  इसके बाद इसका पुत्र कल्याण राज अर्थात अधिधज राजा बना! 

3- कल्याण राज- उसकी पत्नी का नाम लद्धा देवी था! उसके बाद त्रिभुवन राज गद्दी में बैठा! 

4- त्रिभुवन राज- बसंत देव के समान त्रिभुवन महाराजाधिराज परमेश्वर तथा परमभट्ठारक की उपाधि धारण की थी  त्रिभुवन राज अपने दानवीर प्रगति के लिए जाना जाता था इसने कई मंदिरों के लिए भूमि दान की थी यह इस वंशिका अंतिम राजा था इसलिए किरातों तथा शोखा जनजाति से मैत्री संबंध स्थापित किए थे इसके किरात मित्र द्वारा गंवियपिंड देवता को  ढाई द्रोण दान दिए जाने का जिक्र भी प्राप्त होता है! 
नालंदा अभिलेख से पता चलता है कि धर्मपाल ने त्रिभुवनराज के समय उत्तराखंड में आक्रमण किया और इस समय का फायदा उठाते हुए निम्बर राजवंश ने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की! 

👉 द्वितीय परिवार (निम्बर राजवंश)-
राजा निम्बर- पांडुकेश्वर ताम्रपत्र तथा बागेश्वर शिलालेखों से इस वंश के राजाओ की जानकारी मिलती है! 
राजा निम्बर इस राजवंश का स्थापक था जो शैव  का अनुयाई था! और भगवती नंदा का आराधक था! 
इसकी पत्नी का नाम दाशु या नाथु देवी था! उसके पुत्र का नाम इष्टगण था! 
Note-
निम्बर को  पांडुकेश्वर ताम्रपत्रों मे श्री निम्वरम् तथा बागेश्वर शिलालेख मे निंबर्त कहा है! 
ललितसुर देव के ताम्रपत्रों में उसकी प्रशंसा की गई है! 

इष्टगण- यह पहला शासक था जिसने संपूर्ण उत्तराखंड को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया  इसने परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की  इसकी पत्नियों के नाम वेगादेवी और धरा देवी मिलता है!  धरा देवी  के पुत्र का नाम ललितसूर देव था जो बाद में राजा बनता है इसके ताम्र अभिलेखों में इष्टगण को परममाहेश्वर और परम ब्राह्मण कहा गया है! 
 Note- इसने तराई भाबर क्षेत्र में शत्रु को हराया था! 
इसने जागेश्वर में नव दुर्गा मंदिर,लवलीश  मंदिर तथा नटराज मंदिर का निर्माण कराया था! 

 ललितसुर देव- यह 832ई.में गद्दी में बैठा इसने अपने पिता की भांति परम भट्ठारक महाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की! 
की अन्य उपाधि परममाहेश्वर तथा  परम ब्राह्मण थी! 
पांडुकेश्वर से इसके दो ताम्र अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिसमें इसे वाराहअवतार के सामान बताएं! 
इस की दो पत्नियां थी लया देवी और सामा देवी थी! सामा देवी के पुत्र का नाम  भूदेव था जो इसके बाद राजा बनता है! 
Note- बागेश्वर में बैजनाथ मंदिर का निर्माण भूदेव ने कराया परंतु यहां नारायण मंदिर का निर्माण सामा देवी ने कराया! 

भूदेव- यह कट्टर ब्राह्मण धर्मावलम्बी था  इसकी उपाधि परम भट्ठारक महाराजअधिराज परमेश्वर,  परम ब्राह्मण भक्त तथा बुद्ध श्रवण शत्रु थी! 
इसने बागेश्वर में शिलालेख उत्तीर्ण कराया था  इस वंश की राजधानी बागेश्वर की गरुड़ घाटी एवं कार्तिकेयपुर दोनों थी!  
इसके बाद सलोणादित्य वंश का उदय हुआ! 

सलोणादित्य वंश- इस वंश की जानकारी हमें पांडुकेश्वर ताम्रपत्र तथा देशटदेव के बालेश्वर ताम्रपत्र  से पता चलती है! इस वंश का पहला शासक सलोणादित्य था! 
सलोणादित्य- इसकी पत्नी का नाम सिंधवली देवी था  इसे अभिलेखों में भानुदित्य की भांति स्वभुजा से राज्य प्राप्त करने वाला शासक कहा गया है! 

इच्छटदेव- सलोणादित्य के पुत्र पदमटदेव के ताम्रपत्र में इसे ब्राह्मण भक्त शासक कहां है इसकी रानी का नाम सिंधु देवी था इसका राज्य वर्तमान चंपावत पिथौरागढ़ क्षेत्र तक विस्तृत था! 

देशटदेव- ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि इसने अपने शासन के 5 वर्ष विजयेश्वर मंदिर को एशाल विषय के अंतर्गत यमुना नामक ग्राम अग्रहार के रूप में दिया! यह राजा दीन दुखियों का रक्षक एवं स्वर्ण दानदाता के नाम से भी जाना जाता है! इसकी पत्नी का नाम पझल्ल देवी था इन के पुत्र का नाम पदम देव था जो देशटदेव  के बाद राजा बनता है! 

Note-  देशटदेव  का चंपावत के बालेश्वर मंदिर में ताम्रपत्र है जिसमें किसी शत्रु के प्रयास को विफल बनाने वाला कहा गया है! 

पद्मदेव- इसका ताम्रपत्र पांडुकेश्वर से प्राप्त हुआ जिससे हमें पता चलता है कि इसने 25 वर्ष से अधिक दान किया तथा अपने शासन के 25 वर्ष बद्रीनाथ मंदिर के नाम पर भूमि दान की इसके बाद का पुत्र सुभिक्षराज गद्दी में बैठता है! सुमिक्षराज के ताम्रपत्र में इसे  परम माहेश्वर,ब्राह्मण भक्त एवं सूर्य के समान प्रकाशवान, कर्ण, दधीचि, चंद्रगुप्त से अधिक दानदाता कहा गया है! 

सुभिक्षराज - इसे वैष्णव तथा परम ब्राह्मण का जाता है यह शास्त्रों के अनुसार शासन करने वाला शासक था इसने सुभिक्षपुर नामक नगर बताया और इसे अपनी राजधानी बनाया! यह कार्तिकेयपुर राजवंश का अंतिम शासक था

 Note- जागरों एवं पवांडो के अनुसार सुभिक्षराज के पुत्र नरसिंह के द्वारा कार्तिकेयपुर से बैजनाथ यानी कत्यूरी घाटी राजधानी  स्थानांतरित की! 






वर्णमाला

                  वर्णमाला का परिचय
अभिव्यक्ति की सार्थक लघुत्तम वाक् ध्वनि को वर्ण कहते हैंl
Important-
👉 भाषा की सबसे छोटी मौखिक इकाई ध्वनि है! 
👉 भाषा की सार्थक लघुतम इकाई शब्द कहलाती है! 
👉 पद की सबसे छोटी इकाई अक्षर है! 
👉 भाषा की सार्थक इकाई वाक्य है! 
वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैंl
हिंदी वर्णमाला-
हिंदी वर्णमाला में कुल वर्ण 52 है है परंतु इनकी मूल संख्या 44 है इसमें स्वरों की मूल संख्या 11 व व्यंजनों की मूल संख्या 33 हैl
Note- स्वर की संख्या 11 तथा व्यंजनों की कुल संख्या 39 और दो अयोगवाह वर्ण (अं,अ:) होते हैं इनको मिलाकर कुल वर्णमाला मे वर्णों की संख्या 52 होती है! 

                           वर्ण के भेद
हिंदी वर्णमाला में वर्णों के दो भेद होते हैं-
स्वर वर्ण
व्यंजन वर्ण

स्वर वर्ण- जिनका अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है और बोलने में कम समय लगता है उन्हें स्वर कहते हैं!
 
Note- वर्ण के उच्चारण में लगने वाले समय को मात्रा कहते हैं 'अ' को छोड़कर प्रत्येक स्वर की मात्रा होती है! 

स्वर के मुख्यतः तीन भेद होते हैं-
ह्रस्व स्वर/लघु स्वर/मूल स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगे उन्हें मूल स्वर कहते हैं! 
यह चार प्रकार के होते हैं- अ,इ,उ, ऋ
नोट- वर्ण के उच्चारण में लगने वाले समय को मात्रा कहते हैं! 
'ऋ' लिखने की दृष्टि से स्वर है परंतु उच्चारण की दृष्टि से व्यंजन है! 

दीर्घ स्वर/संयुक्त स्वर- जिन स्वरो के उच्चारण में मूल स्वर से दुगना समय लगे उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं ये 7 प्रकार के होते हैं-
आ- अ/आ+अ/आ
ई- इ/ई+इ/ई
ऊ-उ/ऊ+उ/ऊ
ए- अ/आ+इ/ई
ऐ-अ/आ+ए/ऐ
ओ- अ/आ+उ/ऊ
औ- अ/आ+ओ/औ
Note- ए,ओ  को शुद्ध संयुक्त स्वर कहते हैं! 

3- प्लुत स्वर- वे स्वर जिनके उच्चारण में मूल स्वर से समय लगे  और नाटक की व्यंग के लिए प्रयोग किया जाए- ओऊम (ॐ) 

स्वर के अन्य प्रकार-
👉 जीभ  की क्रियाशीलता के आधार- इसके स्वर तीन प्रकार के होते है-

1-अग्र स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का अग्रभाग सक्रिय होता हो वह अग्रस्वर कहलाते है! 
यह चार प्रकार के होते हैं- इ,ई, ए,ऐ

2-मध्य स्वर- जिन स्वरो के उच्चारण में जीभ का मध्य भाग सक्रिय होता है उन्हें मध्य स्वर कहते हैं- अ

3-पश्च स्वर- वे स्वर जिनके के उच्चारण में जीभ का पश्च भाग सक्रिय होता हो उन्हें पश्च स्वर कहते हैं- आ, उ, ऊ, ओ, औ, ऑ

Note- 'ऑ' का प्रयोग अंग्रेजी शब्दों के लिए किया जाता है- कॉलेज डॉक्टर इत्यादि

👉ओष्ठों के गोलाई के आधार पर- होठों/ओष्ठों की गोलाई के आधार पर स्वरो  को दो भागों में बांटा गया-
1- व्रत्तमूखी  स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में होठों का आकार गोलाकार होता है उन्हें व्रत्तमूखी या वृत्ताकार स्वर कहते हैं- उ, ऊ, ओ, औ, ऑ

2-अव्रत्तमुखी स्वर- जिन स्वरो के उच्चारण मे होठों का आकार वृत्ताकार ना हो उन्हें अव्रत्तमुखी या अव्रत्तमुखी स्वर कहते है- अ, आ, इ, ई, ए, ऐ

👉मुखाकृति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण-

1. संवृत स्वर-संवृत स्वर के उच्चारण में मुख द्वार सकरा हो जाता है। ये संख्या में चार होते है - इ , ई , उ , ऊ 

2. अर्द्ध संवृत स्वर -अर्द्ध संवृत स्वर के उच्चारण में मुख द्वार कम सकरा होता है। ये संख्या में 2 होते है - ए , ओ 

3. विवृत स्वर-विवृत स्वर के उच्चारण में मुख द्वार पूरा खुला होता है। ये संख्या में 2 है - आ , आँ 

4. अर्द्ध विवृत स्वर-अर्द्ध विवृत स्वर के उच्चारण में मुख द्वार अधखुला होता है। ये संख्या में 4 होते है - अ , ऐ , औ , ऑ


👉 हवा के मुंह या नाक से निकलने के आधार पर- हवा के मुंह या नाक से निकलने के आधार पर स्वरों को दो भागों में बांटा गया! 
1-अनुनासिक स्वर-  जिन  स्वरो  के उच्चारण में वायु मुख के साथ-साथ नाक से बाहर निकलती है उन्हें अनुनासिक स्वर कहते हैं अनुनासिक स्वरूप को चंद्रबिंदु लगाकर दिखाया जाता है- जैसे- अँ,एँ, 
अन्य उदाहरण शब्द रूप - अंधेरा आंखें ऊँट

2- निरनुनासिक- जिन स्वरों के उच्चारण में धोनी केवल मुख से बाहर निकलती है अर्थात वर्णमाला के 11 स्वर निरनुनासिक के अंतर्गत आते हैं! 
जैसे- अ,आ, ई....... .............. ओ, औ

👉 जाति के आधार पर स्वर- जाति के आधार पर स्वरों को दो भागों में बांटा गया-
1-सवर्ण/सजातीय स्वर- जिन  स्वरूप का उच्चारण समाधि स्थान और समान प्रयत्न से हो सवर्ण स्वर कहलाते हैं- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ
2-असवर्ण/विजातीय स्वर- वे स्वर जिन का उच्चारण स्थान अलग और प्रयत्न भी अलग असवर्ण स्वर कहलाते हैं- ए, ऐ, ओ, और

👉 उच्चारण स्थान के आधार पर स्वर- स्वरों के उच्चारण के समय जीह्वा मुख के विभिन्न भागो को स्पर्श करती है इस आधार पर इनका वर्गीकरण निम्न है-
(1) कण्ठय् स्वर – अ, आ, अः
(2) तालव्य स्वर – इ, ई
(3) मूर्धन्य स्वर – ऋ
(4) ओष्ठम स्वर – उ, ऊ
(5) कण्ठ तालव्य स्वर – ए, ऐ
(6) कण्ठ ओष्ठ स्वर – ओ, औ
(7) नासिक्य स्वर – अं
👉नोट- अं,अ: अयोगवाह वर्ण होते हैं अं को  अनुस्वार और अ: को विसर्ग कहते है! इनको स्वरों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है! 
👉 सभी स्वर सघोष तथा अल्पप्राण होते हैं! 
Note-  सघोष का अर्थ होता है जिन्हें बोलने में   कंपन उत्पन्न हो और अल्पप्राण में होता है  जिनके उच्चारण करने पर हुआ मुख से कम बाहर निकले ! 


                                 व्यंजन

लेखन जारी है........... 



Saturday, January 22, 2022

देवनागरी लिपि का विकास और गुण तथा दोष

                    देवनागरी लिपि
प्राचीन काल में सिंधु लिपि खरोष्ठी लिपि तथा ब्राह्मी लिपि थी ब्राह्मी लिपि की दो शैली थी दक्षिणी शैली तथा उत्तरी शैली! 
उत्तरी शैली से गुप्त लिपि का विकास हुआ है और  गुप्त लिपि से सिद्धमात्रिका लिपि (कुटिका लिपि) और सिद्धमात्रिका  लिपि से देवनागरी तथा शारदा लिपि का विकास हुआ! 

देवनागरी लिपि का नामकरण-
नागलिपि से- ललिता विस्तार  में नाग लिपि की चर्चा की गई है कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इसी नाग लिपि से नागरी लिपि का जन्म हुआ है! 
नगर से- कुछ विद्वानों का मत है कि यह लिपि नगरों में विकसित हुई इसलिए इसे नागरी लिपि कहते हैं! 
नागर ब्राह्मण से- देवनागरी लिपि का पहला साक्षी गुजरात के राजा जय भट्ट के अभिलेखों  में मिलता है और गुजरात के नागर ब्राह्मण के कारण इसे नागरी लिपि कहा जाता है! 
नागर व देव से- कुछ इतिहासकारों का मानना है कि चंद्रगुप्त को देव तथा पाटलिपुत्र को नगर कहा जाता था इसका विकास यहीं से हुआ है इसलिए इसका नाम देवनागरि पड़ा! 
स्थापत्य शैली नाम पर- डॉक्टर धीरेंद्र वर्मा के अनुसार मध्यकाल में स्थापत्य इस शैली नागर शैली थी जिस कारण इसका नाम नागर शैली के कारण पड़ा! 

देवनागरी लिपि का विकास- 
1- फोर्ट विलियम कॉलेज अध्यक्ष जॉन गिलक्राइस्ट देवनागरी लिपि के विरोधी थे तथा वह फारसी लिपि को प्रोत्साहन देना चाहते थे और हिंदी के स्थान पर हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग करना चाहते हैं परंतु विलियन प्राइम ने 1813 में फारसी के स्थान में देवनागरी तथा हिंदुस्तानी के स्थान पर हिंदी भाषा को प्रोत्साहन देने की बात की! 

2- राजा सितारे हिंद ने 1868 में फारसी के स्थान पर देवनागरी लिपि का प्रयोग करने के लिए  अहम भूमिका निभाई! 

3- पंडित गौरी दत्त जी ने 874 में नागरिक प्रकाश पत्र निकाला जिसने देवनागरी के विकास और सुधार में अहम भूमिका निभाई! 

4- 1893 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की तथा कचहरी भाषा में फारसी लिपि के  स्थान में देवनागरी लिपि के प्रयोग की बात की जो 1898 में सफल हुई

5- 1928 में नेहरू समिति ने रिपोर्ट दी और कहा देवनागरी लिपि तथा फारसी लिपि मिश्रित हिंदुस्तानी भाषा देश की राज्य भाषा होगी! 

6- संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को  अनुच्छेद 343(1) के अनुसार संस्कृत मिश्रित खड़ी बोली से विकसित हिंदी भाषा भारत की राजभाषा होगी जो देवनागरी लिपि  लिखी जाएगी! 

देवनागरी लिपि के गुण-
👉यह बाएं से दाएं लिखी जाने वाली अक्षरात्मक लिपि है जिसका विकास वर्णनात्मक लिपि से हुआ है! 
👉 प्रत्येक ध्वनि के अलग वर्णों की व्यवस्था है  और ध्वनि का नाम ही वर्ण का नाम है अर्थात हर वर्ण अपनी स्वतंत्र ध्वनि रखता है! 
👉 इसमें मुक वर्ण नहीं होता है  एक वर्ण में दूसरे का भ्रम नहीं होता है! 
👉 राहुल सांकृत्यायन के अनुसार यह दुनिया की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है! 
👉 देवनागरी लिपि का व्यापक प्रयोग किया जाता है संस्कृत हिंदी नेपाली मराठी इत्यादि  भाषाएं देवनागरी लिपि के अंतर्गत आती हैl

देवनागरी लिपि की कमियां-
👉 मुद्रण में कठिनाई क्योंकि इसमें टाइप/अक्षर बहुत अधिक हैl
👉 मात्राओं का प्रयोग दाएं बाएं ऊपर नीचे होता हैl
👉 त्वरालेखन  का अभाव बहुत अधिक दिखता है l
👉 कुछ ऐसी दुनिया है जिनके चिन्ह एक से अधिक होते हैं जैसे-   'र'   की मात्रा
👉 कुछ वर्ण भ्रम की स्थिति पैदा करते है जैसे ख,रव

व्यक्तिगत रूप से देवनागरी लिपि में सुधार के प्रयास-
👉 1964 में बाल गंगाधर तिलक ने तिलक फाण्ट का निर्माण किया इसका प्रयोग उन्होंने केसरी नामक पत्रिका में किया इन्होनें 403 टाइप को 190 टाइप मे बदला! 
👉 सावरकर बंधु अ की बारघड़ी लाए- अ आ अ्इ.....  जिसका प्रयोग हरिजन सेवक नामक पत्रिका में महात्मा गांधी ने किया! 
👉 श्यामसुंदर बजाज ने पंचमाक्षर के स्थान में अनुस्वार का प्रयोग को प्राथमिकता दी-
गंड्गा 👉 गंगा

विभिन्न संस्थानों द्वारा देवनागरी के विकास में किए गए कार्य-
👉 1935 में हिंदी साहित्य सम्मेलन इंदौर में हुआ इसके संयोजक काकासाहेब कालेकर व अध्यक्ष  महात्मा गांधी थे इस समिति ने नागरी  लिपि सुधार समिति की स्थापना की! 
👉 आचार्य नरेंद्र देव ने 21 जुलाई 1947 को नागरी लिपि सुधार परिषद का गठन किया जिसने अपने रिपोर्ट 25 मई 1949 को दिए 1953 में इस समिति की अध्यक्षता डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कि यह सम्मेलन लखनऊ में हुआ! 
❤ सुमिति कुमार चटर्जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने देवनागरी लिपि की जगह रोमन लिपि का प्रयोग को प्राथमिकता दी✌

हर्ष के पश्चात उत्तराखंड की स्थिति

              हर्ष के पश्चात मध्य हिमालय
हर्ष के  पश्चात हिमालय क्षेत्र बरहमपुर शत्रुघ्न और गोविषाण राज्य में टूट गया इनमें सबसे बड़ा राज्य बरहमपुर राज्य था! 
                       ब्रह्मपुर राज्य
यह राज्य गंगा से लेकर करनाली नदी तक फैला हुआ था यह राज्य पौरव राजवंश के अधीन था! इनका शासन यहां 6वि सदी से आठवीं सदी तक रहा यह राजा सोनवंशी राजा थे! 1915 में अल्मोड़ा के तारकेश्वर से  इस वंश का ताम्रपत्र मिला जिसमें धुतिवर्मन, विषणुवर्मन, विषवर्मन, अग्निवर्मन धुतिवर्मन  के नामों का वर्णन है! यह राजा महाराजा अधीराज परम भट्ठारक की उपाधि लेते थे इनके कुलदेवता विरणेश्वर स्वामी थे! 
बरहमपुर राज्य को इंद्र की राजधानी और नगरों में श्रेष्ठ के रूप में जाना जाता है तामपत्रो मे इसकी राजधानी तालकेश्वर छेत्र मानी जाती है ! 
 Note-
पर्वताकार वंश के अभिलेखों की भाषा संस्कृत भाषा तथा लिपि गुप्त ब्राह्मी लिपि थी इनके ताम्रपत्र के साथ एक अंडाकार मुद्रा जोड़ी थी जिसमें वृषभ मकर और गरुड़  के चित्र अंकित थे  इन मुद्राओं में संस्कृत भाषा तथा कुटिला लिपि अंकित थीl
इनके शासकों के निवास स्थान को कोट कहा जाता था
पौरव शासकों के आय का मुख्य स्त्रोत भूमि कर था जिसे भाग कहा जाता था इसे वसूल करने वाले अधिकारी को मार्गक कहा जाता था
इस वंश में सिंचित क्षेत्र को केदार तथा गैर सिंचित क्षेत्र को सारी कहा जाता था! 
भूमि माप के लिए द्रोणवाप
खारीवाप और कुल्यावाप विधि का प्रयोग किया जाता है! 

                       शत्रुघ्न राज्य
हवेनसांग के अनुसार इस राज्य की पूर्वी सीमा गंगा व उत्तर में हिमालय और राज्य के मध्य से यमुना नदी बहती थी लेकिन कनिंघम के अनुसार यह राज्य सिरमौर का हिस्सा था! 

                        गोविषाण
इसे वर्तमान में काशीपुर के नाम से जाना जाता है कनिंघम के अनुसार गोविषाण  राज्य में काशीपुर के साथ-साथ रामपुर और पीलीभीत जनपद भी थे इसका विस्तार रामगंगा से लेकर शारदा तक था ! 

कंप्यूटर विज्ञान

                      कंप्यूटर विज्ञान
कंप्यूटर एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक्स डिवाइस है  जो इनपुट प्राप्त करके उसे प्रोसेस करता है तथा सूचना प्राप्त करने के लिए आवश्यक निर्देशों का पालन करता है! 
चार्ल्स बैबेज को आधुनिक  कंप्यूटर का सर्वप्रथम विचार देने के कारण कंप्यूटर का पिता कहा जाता है! 
1937 ईस्वी में मार्क-1 नाम के प्रथम के  कंप्यूटर का निर्माण किया गया! 
भारत में कंप्यूटर का विकास 1955 स्पीच से प्रारंभ हुआ परंतु 1984 ईस्वी में जाकर ही इसे पर्याप्त महत्व मिला! 
1998 ईस्वी में भारत ने सुपर कंप्यूटर परम 1000 का विकास कर संपूर्ण विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया! 
कंप्यूटर मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं;-
1-माइक्रो कंप्यूटर 
2-सुपर कंप्यूटर 
3-मेनफ्रेम कंप्यूटर 
4-मिनी कंप्यूटर

1- माइक्रो कंप्यूटर- यह सबसे कम शक्तिशाली किंतु सबसे अधिक प्रचलित कंप्यूटर है कंप्यूटरों में सर्वाधिक प्रयोग इन्हीं का होता है यह चार प्रकार के होते हैं डेस्कटॉप ,नोटबुक, टेबलेट पीसी और हैंडहेल्ड कंप्यूटर
हैंडहेल्ड कंप्यूटर को पामटॉप कंप्यूटर भी कहते हैं! 

2- सुपर कंप्यूटर- यह सबसे शक्तिशाली कंप्यूटर होता है इनका  स्मृति भंडार 52 मेगाबाइट से अधिक होता है और यह 500 एम फ्लाप की क्षमता से कार्य करते हैं परम-10000 स्तर का सुपर कंप्यूटर एशिया में भारत के अतिरिक्त मात्र जापान के पास है! 

3- मेनफ्रेम कंप्यूटर- यह विशेष रूप से बने वातानुकूलित कमरे में रखे जाते हैं यह सुपर कंप्यूटर की तरह शक्तिशाली नहीं होते हैं लेकिन इनकी प्रोसेसिंग की गति एवं भंडारण क्षमता बहुत अधिक होती है बीमा कंपनी तथा अन्य प्रकार की कंपनी में इनका प्रयोग किया जाता है! 

4- मिनी कंप्यूटर- इन्हें मिडरेंज कंप्यूटर भी कहा जाता है इनका आकार रेफ्रिजरेटर के बराबर होता है इनका प्रयोग मुख्यतः  बड़ी कंपनियों में होता है! 

कार्य पद्धति के आधार पर कंप्यूटर के पांच प्रकार होते है-
अंकीय कंप्यूटर 
शंकर कंप्यूटर 
अनुरूप कंप्यूटर 
प्रकाशीय कंप्यूटर 
आणविक कंप्यूटर

कंप्यूटर दो पद्धतियों में कार्य करता है पहले तो इसके निर्माण यंत्रों एवं उपकरणों से होता है तथा फिर उसके संचालन के लिए विभिन्न प्रकार के प्रोग्रामों का निर्माण किया जाता है इस आधार पर कंप्यूटर की दो पद्धतियां हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर

लेखन जारी है...... 

Monday, December 27, 2021

भाषा, लिपि और व्याकरण

मनुष्य बोलकर अपने भावों को व्यक्त करता है तथा आवश्यकता पढ़ने पर वह लिखकर भी मन की बात को स्पष्ट करता है। इन दोनों का मूल आधार ‘भाषा’ ही है। भाषा शब्द भाष धातु से बना है। इसका अर्थ है-बोलना। मनुष्य जिन ध्वनियों को बोलकर अपनी बात कहता है, उसे भाषा कहते हैं।

भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर व पढ़कर अपने मन के भावों या विचारों को आदान – प्रदान करता है।

भाषा के रूप
भाषा के दो रूप हैं-
CBSE Class 6 Hindi Grammar भाषा, लिपि और व्याकरण

मौखिक भाषा – जब व्यक्ति अपने मन के भावों को बोलकर व्यक्त करता है, तो वह भाषा का मौखिक रूप कहलाता है।
लिखित भाषा – जब व्यक्ति अपने मन के भावों को लिखकर व्यक्त करता है, तो वह भाषा का लिखित रूप कहलाता है।
लिपि – भाषा का प्रयोग करते समय हम सार्थक ध्वनियों का उपयोग करते हैं। इन्हीं मौखिक ध्वनियों को जिन चिह्नों द्वारा लिखकर व्यक्त किया जाता है, वे लिपि कहलाते हैं। लिपि की परिभाषा हम इस प्रकार दे सकते हैं

किसी भी भाषा के लिखने की विधि को लिपि कहा जाता है।
प्रत्येक भाषा के लिपि-चिह्न अलग-अलग होते हैं तथा उन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है। जैसे हिंदी व संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी है। इसी प्रकार अंग्रेजी भाषा की लिपि रोमन, पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी और उर्दू भाषा की लिपि फ़ारसी है।
कुछ प्रसिद्ध भाषाएँ एवं उनकी लिपियों के नाम इस प्रकार हैं-

भाषालिपि
हिंदी, संस्कृत, मराठी
पंजाबी
उर्दू, फ़ारसी
अरबी
बंगला
रूसी
अंग्रेज़ी, जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश
देवनागरी
गुरुमुखी
फ़ारसी
अरबी
बंगला
रूसी
रोमन

भारत में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं; जैसे-हिंदी, संस्कृत, पंजाबी, उर्दू, कश्मीरी, बंगला, उड़िया, तेलुगु, असमिया, सिंधी, गुजराती, बोडो, डोगरी, मैथिली, कन्नड़, संथाली, मणिपुरी, कोंकणी, संथाली, मलयालम, नेपाली, मराठी। इस प्रकार अब भारत में निम्नलिखित 22 (बाईस) भाषाएँ प्रचलित हैं।

संस्कृत भाषा से ही हिंदी भाषा का जन्म हुआ है। 14 सितंबर, 1949 को हिंदी संविधान में भारत की राजभाषा स्वीकार की गई।

भारत के अधिकांश हिस्सों में यही भाषा बोली और समझी जाती है। हिंदी भाषा की पाँच उपभाषाएँ हैं।

उपभाषाबोली
1. पूर्वी हिंदी
2. राजस्थानी हिंदी
3. पहाड़ी हिंदी
4. पश्चिमी हिंदी
5. बिहारी हिंदी
अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी
जयपुरी, मारवाड़ी, मेवाती, मालवी
गढ़वाली, कुमाउँनी, हिमाचली
खड़ीबोली, हरियाणवी, कन्नौजी, ब्रज भाषा
भोजपुरी, मैथिली, मगही।

बोली – सीमित क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा के रूप को बोली कहा जाता है अर्थात स्थानीय व्यवहार में अल्पविकसित रूप में प्रयुक्त होने वाली भाषा बोली कहलाती है। बोली का कोई लिखित रूप नहीं होता।
व्याकरण – भाषा को शुद्ध रूप में लिखना, पढ़ना और बोलना सिखाने वाला शास्त्र व्याकरण कहलाता है।


वर्ण-विचार

बोलते समय हम जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हैं। वही ध्वनियाँ वर्ण या अक्षर कहलाती हैं। वर्ण भाषा की सबसे छोटी इकाई है। इस प्रकार-

वर्ण उस ध्वनि को कहते हैं जिसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते।

लिखित भाषा में प्रयुक्त किए जाने वाले वर्ण प्रत्येक भाषा में अलग-अलग होते हैं। हिंदी भाषा में इन वर्गों की कुल संख्या चवालीस (44) है।
वर्णमाला – वर्गों की माला यानी वर्णमाला। वर्गों के व्यवस्थित रूप को वर्णमाला कहते हैं।
हिंदी वर्णमाला में 11 स्वर और 33 व्यंजन होते हैं।
वर्ण के दो भेद हैं –


CBSE Class 6 Hindi Grammar वर्ण-विचार 1
स्वर वर्ण – जिस वर्ण के उच्चारण में किसी अन्य वर्ण की सहायता न लेनी पड़े उसे स्वर वर्ण कहते हैं।
CBSE Class 6 Hindi Grammar वर्ण-विचार 2
स्वर के तीन भेद होते हैं-

स्वर
ह्रस्व स्वरदीर्घ स्वरप्लुत स्वर
  1. ह्रस्व स्वर – इनके उच्चारण में सबसे कम समय लगता है। ये चार हैं-अ, इ, उ, ऋ।
  2. दीर्घ स्वर-इनके उच्चारण में ह्रस्व स्वरों के उच्चारण से दुगुना समय लगता है। ये सात हैं-आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।।
  3. प्लुत स्वर – इनके उच्चारण में ह्रस्व और दीर्घ स्वरों के उच्चारण से तिगुना समय लगता हैं जैसे-ओऽम्। प्लुत स्वर एक ही है।

अनुस्वार – अं-(ां) वर्ण भी स्वरों के बाद ही आता है। इसका उच्चारण नाक से किया जाता है। इसका उच्चारण जिस वर्ण के बाद होता है, उसी वर्ण के सिर पर (ां) बिंदी के रूप में इसे लगाया जाता है; जैसे-रंग, जंगल, संग, तिरंगा आदि।
अनुनासिक – इसका उच्चारण नाक और गले दोनों से होता है; जैसे–चाँद, आँगन, आदि इसका चिह्न (ँ) होता है।
अयोगवाह – हिंदी व्याकरण में अनुस्वार (अं) एवं विसर्ग (अ:) को ‘अयोगवाह’ के रूप में जाना जाता है।
व्यंजन वर्ण के तीन भेद होते हैं।
व्यंजन – जिन वर्णो का उच्चारण स्वरों की सहायता से किया जाता है, वे व्यंजन कहलाते हैं।

कखगघङकवर्ग
चछजझञचवर्ग
टठडढणड़ढ़टवर्ग
तथदधनतवर्ग
पफबभमपवर्ग
यरलवअंत:स्थ
शषसहऊष्म

 

व्यंजन
1. स्पर्श व्यंजन2. अंतस्थ व्यंजन3. ऊष्मे व्यंजन
  1. स्पर्श व्यंजन – 25
  2. अंतस्थ व्यंजन – 4
  3. ऊष्म व्यंजन – 4

1. स्पर्श व्यंजन – ‘स्पर्श’ यानी छूना। जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय फेफड़ों से निकलने वाली वायु कंठ, तालु, मूर्धा, दाँत या ओठों का स्पर्श करती है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं। क् से लेकर म् तक 25 स्पर्श व्यंजन हैं।
क वर्ग का उच्चारण स्थल कंठ है। ते वर्ग का उच्चारण स्थल दाँत है।
2. अंतस्थ व्यंजन – अंत = मध्य या (बीच, स्थ = स्थित) इन व्यंजनों का उच्चारण स्वर तथा व्यंजन के मध्य का-सा होता है।
(उच्चारण के समय जिह्वा मुख के किसी भाग को स्पर्श नहीं करती) ये चार हैं—य, र, ल, वे।।
3. ऊष्म व्यंजन – ऊष्म-गरम। इन व्यंजनों के उच्चारण के समय वायु मुख से रगड़ खाकर ऊष्मा पैदा करती है यानी उच्चारण के समय मुख से गरम हवा निकलती है। ये चार हैं-श, ष, स, ह।

स्वरों की मात्राएँ-
प्रत्येक स्वरों के लिए निर्धारित चिह्न मात्राएँ कहलाती हैं। ‘अ’ स्वर के अतिरिक्त सभी स्वरों के मात्रा चिह्न होते हैं। स्वरों के चिह्न मात्रा के रूप में व्यंजन वर्ण से जुड़ते हैं।
जैसे-

विसर्ग (:) – इस ध्वनि को चिह्न (:) है। इसका उच्चारण ‘ह’ की भाँति किया जाता है। विसर्ग का प्रयोग तत्सम शब्दों (संस्कृत से आए) में ही किया जाता है; जैसे-अतः, प्रातः, अंततः आदि।
आगत ध्वनि – ऑ यानी अर्धचंद्र, अंग्रेजी भाषा के शब्दों को लिखते समय प्रयोग किया जाता है; जैसे डॉक्टर, कॉफ़ी, टॉफ़ी, बॉल आदि।
संयुक्त वर्ण – वर्गों का मेल वर्ण संयोग कहलाता है। इन वर्षों के अलावा हिंदी भाषा में कुछ संयुक्त वर्गों का भी प्रयोग किया जाता है। ये वर्ण हैं-क्ष, त्र, ज्ञ, श्र।।
जैसे-
क् + ष = क्ष भिक्षा, क्षमा
त् + र = त्र त्रिशूल, त्रिभुज
श् + र = श्र श्रमिक, विश्राम
ज् + अ = ज्ञ संज्ञा, विज्ञान




Wednesday, July 28, 2021

परीक्षा वाणी उत्तराखण्ड प्रश्न संग्रह

1- लोक सेवा आयोग का गठन कब हुआ-  अप्रैल 2001

2- ऐरीज  कि स्थापना कब और कहा हुई- 1954 वाराणसी

3- ऐरीज को शेर का डांडा कब लाये- 1955

4- ऐरीज को मनोरा पिक मे कब लाये- 1961

5- ऐरीज स्वायत्ताशासी संस्थान बना-2004

6- एशिया कि सबसे बडी दुरबीन  कहा और कब लगी- 30 मार्च 2016 देवस्थल

7- सम्पूर्णानन्द आप्टिकल दूरबीन है- 2010 मनोरा चोटी

8- भारतीय वन अनुसंधान संस्थान की स्थापना- 1906 देहरादून

9- भारतीय पशुचिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान की स्थापना- 1893 एल्फ्रेड लिंगार्ड मुक्तेश्वर

10- रिडंरपेस्ट टिके की खोज की थी- 1924 एडवर्ड

11- इंपीरियल बायोलॉजिकल आफ वेटरनरी नाम कब इंपीरियल इंस्टिट्यूट ऑफ वेटरनरी रिसर्च रखा गया- 1925

12- भारतीय सर्वेक्षण विभाग की स्थापना कब हुई और यह देहरादून कब आया- क्रमशः 1767,1942

13- भारत का प्रथम डाक टिकट कब और किस विभाग से जारी हुआ- 1854 भारतीय सर्वेक्षण विभाग

14- विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की स्थापना- 1924 कटारमल बोसी सेन

15- हाई अल्टीट्युड प्लांट फिजिओलाजी रिसर्च सेंटर है- श्रीनगर

16- राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की स्थापना- 17 जनवरी 2006 नरेंद्र नगर

17- राज्य का सबसे पुराना संग्रहालय कौन सा है- 1914 देहरादून वन संग्रहालय

18- पंडित गोविंद बल्लभ पंत राजकीय संग्रहालय है- 1979 अल्मोड़ा

20- लोक संस्कृति संग्रहालय स्थित है- खूटानी भीमताल

21- हिमालय पुरातत्व एवं नृवंशीय संग्रहालय है -1980 श्रीनगर

22- हिमालयन संग्रहालय स्थित है- उत्तरकाशी 1965

23- हिमालय संग्रहालय स्थित है- नैनीताल 2005

24- कालू सिंह मेहरा का जन्म हुआ- 1831-1906

25- बद्री दत्त पांडे का जन्म हुआ- 15 फरवरी 1882 कनखल

26- बद्री दत्त पांडे अल्मोड़ा अखबार के संपादक बने- 1913

27- हर गोविंद पंत ने कुलीन ब्राह्मणों की हाल चलाने वाली प्रथा कब तोड़ी- 1928 बागेश्वर

28- अल्मोड़ा कांग्रेस की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है-हरगोविंद पंत

29- 1857 क्रांति के समय कुमाऊं कमिश्नर थे- हेनरी रैम्जे

30- बद्री दत्त पांडे को कुर्वांचल केसरी की उपाधि दी थी- महात्मा गांधी

31- भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान प्रथम नजरबंद क्रांतिकारी कौन था- हरगोविंद  पंत अल्मोड़ा

32- बैरिस्टर मुकुदी लाल का जन्म कब हुआ- 14 अक्टूबर 1885

33- 1919 में मुकुंदी लाल को कौन सी जेल में रखा  गया- नैनी (इलाहाबाद) जेल

34- मुकुदी लाल ने स्वराज दल के टिकट से चुनाव कब जीता- 1926

35- मौला राम के चित्रों को प्रकाशन में लाने का श्रेय जाता है- बैरिस्टर मुकंदी लाल

36- गढ़वाल पेंटिंग के रचनाकार कौन है- 1969 मुकंदी लाल

37- दलितो को शिल्पकार शब्द सबसे पहले किसने दिया- खुशीराम आर्य

38- शिल्पकार सुधारने सभा की स्थापना किसने की- खुशीराम आर्य

39- सबसे लंबी अवधि तक विधायक और मंत्री पद में रहने वाले उत्तराखंडी- बलदेव सिंह आर्य

40- गोविंद बल्लभ पंत का जन्म कब हुआ- 10 सितंबर 1887

41- पंडित गोविंद बल्लभ पंत को हिमालय पुत्र की उपाधि किसने दी- पंडित जवाहरलाल नेहरू

42- प्रेम सभा की स्थापना 1914 में किस उद्देश्य की- हिंदी के प्रचार के लिए काशीपुर

43- प्रेम से बातचीत की शाखा थी- नागरी  प्रचारिणी सभा की

44- गोविंद बल्लभ पंत धार जिले से विधान परिषद सदस्य कब चुने गए- 1923

45- साइमन कमीशन के विरोध में नेहरू के प्राणों की रक्षा करते समय पंडित गोविंद बल्लभ पंत कब गंभीर रूप से घायल हुए- 29 नवंबर 1928

46- उत्तर प्रदेश में पहला कांग्रेसी मंडल कब और किसके नेतृत्व में बना-1937 पंडित गोविंद बल्लभ पंत

47- गोविंद बल्लभ पंत को अहमदनगर किले में कब नजरबंद किया गया- 31 मार्च 1945

48- गोविंद बल्लभ पंत ग्रह मंत्री कब बने- 10 जनवरी 1955 को

49- गोविंद बल्लभ पंत को भारत रत्न कब मिला- 26 जनवरी 1957

50- काली कुमाऊं का शेर हर्ष देव औली का जन्म कब हुआ- 4 मार्च 1990 गोसानी खेतीखान चंपावत

51- लाहौर कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में कुमाऊं का प्रतिनिधित्व किया था- 1929  हर्ष देव औली

52- गढ़ केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा का जन्म कब हुआ- 1894-1943

53- उत्तराखंड में गांधीवादी विचारधारा के प्रवक्ता प्रयाग दत्त पंत जी का जन्म कब हुआ- 1898-1935

54- उत्तराखंड की धरती पर आंदोलन की शुरुआत करने का श्रेय जाता है- प्रयाग दत्त पंत

55- एक आम सीट पर निर्वाचित होने वाले प्रथम हरिजन सदस्य कौन थे- बिहारी लाल चौधरी

56- 1929 लाहौर के ऐतिहासिक कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया- बिहारी लाल चौधरी ने

57- बिहारी लाल चौधरी को कब विजय लक्ष्मी पंडित का संसदीय सचिव बनाया गया- 1937

58- मोहन सिंह मेहता का जन्म कहां हुआ- 1897 बज्यूला बागेश्वर

59- कत्यूर में कुमाऊं परिषद की शाखा किसने गठित की- 1921 मोहन सिंह मेहता ने

60- स्वतंत्रता संग्राम में कुमाऊ का योगदान पुस्तक किसकी है- इंद्र सिंह नयाल 1973

61- दुगड्डा में शहीद मेले की शुरुआत किसने की-भवानी सिंह रावत

62- उत्तराखंड से एकमात्र सदस्य जो हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र की संगम में था- भवानी सिंह रावत

63- कुमाऊं राजपूत परिषद का गठन किसने किया-सोवन सिंह जीना

64- श्रीधर कीमोठी आजाद का जन्म कब हुआ-1919-2005

65- परिपूर्णानंद पैन्यूली ने राजा मानवेंद्र साहब को कब पराजित किया- 1977

66- देसी राज्य और जन आंदोलन नेपाल का पुनर्जागरण किसकी पुस्तक है- परिपूर्णानंद पैन्यूली

67- चारों धामों में हरिजनों को प्रवेश कराने का श्रेय जाता है- परिपूर्णानंद पैन्यूली

68- परिपूर्णानंद पैन्यूली को डॉक्टर अंबेडकर अवार्ड मिला- 1996

69- भक्त दर्शन का जन्म हुआ- 12 फरवरी 1912 पौडी

70- गढ़वाल के दिवंगत विभूतियां सुमन स्मृति ग्रंथ कलाविद मुकंदी लाल बैरिस्टर मुकंदी लाल स्मृति ग्रंथ स्वामी रामतीर्थ स्मृति ग्रंथ किसने लिखा है- भक्त दर्शन

71- टिहरी प्रजामंडल की स्थापना कब हुई-23 जनवरी 1939 देहरादून

72- श्री देव सुमन पर राजद्रोह का मुकदमा लगा-21 फरवरी 1944

73- श्री देव सुमन ने अपना अनशन कब शुरू किया-29 फरवरी 1944

74- श्री देव सुमन ने अपना आमरण अनशन कब शुरू किया-3 मई 1944

75- श्री देव सुमन की मृत्यु कब हुई- 25 जुलाई 1944, 84 दिन का अनशन के कारण

76- यूके विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद का गठन- 21 फरवरी 2005

77- उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र की स्थापना- 2 फरवरी 2006

78- उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र की स्थापना- 21 सितंबर 2005

79- किस योजना उपदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने कर लोगों का जीवन स्तर को उठाना है- रूटैग

80- आरोही परियोजना किसके सहयोग द्वारा चलाई जा रही है- 19 मई 2002 माइक्रोसॉफ्ट तथा इंटेल कंपनियों के सहयोग से

81- शिकारी परियोजना किसके सहयोग द्वारा चलाई जा रही हैं- एक्टर व ई.सी.आई.एल. कम्पनियों 

82- ई गवर्नेंस वर्ष कब घोषित किया गया- 2001

83- भू अभिलेखों के लिए कौन सा सॉफ्टवेयर बनाया गया - देवभूमि

84- ई डिस्ट्रिक्ट परियोजना कब शुरू हुई- 2009

85- उत्तराखंड का प्रथम आयुष ग्राम कौन सा है- भवाली नैनीताल

86- पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क की स्थापना- 25 फरवरी 2009

87- सोलर सिटी में देश के 11 शहर सम्मिलित है उसमें उत्तराखंड का कौन सा शहर है -देहरादून

88- फेलोशिप पुरस्कार किस क्षेत्र में दिया जाता है- पर्यावरण सुरक्षा के क्षेत्र मे

89- पर्यावरण मित्र योजना कब से शुरू हुई- 2006 श्रीनगर हरक सिंह रावत

90- इको टेक्स कब से लागू हुआ- 21 सितंबर 2009 मसूरी

91- गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत कब से हुई- 14 जून 1985 वाराणसी राजीव गांधी

92- गंगा की सफाई हेतु स्वामी निगमानंद ने कितने दिनों का अनशन किया- 2008 68 दिन का

93- स्वच्छ गंगा मिशन की शुरुआत कब हुई- अक्टूबर 2009 लक्ष्य 2020

94- स्पर्श गंगा अभियान की शुरुआत- 17 दिसंबर 2009

95- गंगा स्वच्छता दिवस कब मनाया जाता है-17 दिसंबर

96- नमामि गंगे अभियान की घोषणा कब हुई- 2014 लागू- 7 जुलाई 2016

97- नमामि गंगे अभियान के दौरान कितने जैव विविधता संरक्षण केंद्रों की स्थापना हुई- 8 ऋषिकेश और देहरादून

98- मौलाराम की माँ का नाम क्या था- रामोदेवी

99- अभिज्ञान शाकुंतलम् का हिंदी अनुवाद किसने किया था- मोलाराम

100- ऋतु वर्णन श्रीनगर दुर्दशा अपने बनाए चित्रों पर लिखी कविताएं किसकी रचना है-मौलाराम

101- भैरव दत्त जोशी का संबंध किससे है-चित्रकार 

102- मित्रता की यात्रा किसकी रचना है- नारायण सिंह थापा

103- उत्तराखंड राज्य की मांग करने वाले पहले राजनेता कौन थे- इंद्रमणि बडोनी

104- लखनऊ के आर्ट कॉलेज में प्रधानाचार्य नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय कौन थे- रणवीर सिंह बिष्ट

105- रणवीर सिंह को पद्मश्री कब मिला-1991 कला के क्षेत्र में पद्मश्री पाने वाले प्रथम व्यक्ति

106- पहाड़ी लोक नृत्य, पहाड़ी सीत से बचने का सहारा, पहाड़ी घसियारे किसक किसके चित्र हैं-रणवीर सिंह बिष्ट

107- नाद नंदनी पुस्तक किसकी है- केशवदास अनुरागी

107- केशवदास अनुरागी का शोधपरक लेख कौन सा है- ढोल सागर

108- विचित्र बेला नामक वाद्य यंत्र किसने बनाया- धरणीधर चंदोला

109- भीमताल में लोक संस्कृति संग्रहालय की स्थापना कब हुई- 1983

110- यशोधर मठपाल को पद्मश्री कब मिला-2005

111- यशोधर मठपाल का जन्म कब हुआ- 1939 अल्मोड़ा

112- कुमाऊं हिमालय टेंपटेशन्स और नैनीताल दि लैंड ऑफ ट्रम्पटे एन्ड  एंड सांग्स पुस्तके किसकी है- अनुप शाह

113-