Friday, January 28, 2022

संधि

                    संधि और उसके प्रकार
संधि-जब तो समीपवर्ती वर्णों के मेल से जो विकार या परिवर्तन होता है  उसे संधि कहते हैं यह तीन प्रकार की होती है स्वर संधि व्यंजन संधि विसर्ग संधि

स्वर संधि की परिभाषा

जब दो स्वर आपस में जुड़ते हैं या दो स्वरों के मिलने से उनमें जो परिवर्तन आता है, तो वह स्वर संधि कहलाती है। जैसे :

  • विद्यालय : विद्या + आलय 

इस उदाहरण में आप देख सकते है कि जब दो स्वरों को मिलाया गया तो मुख्य शब्द में हमें अंतर देखने को मिला। दो आ मिले एवं उनमे से एक आ का लोप हो गया।

  • पर्यावरण : परी + आवरण 

ऊपर दिए गए उदाहरण में जैसा कि आपने देखा दो स्वरों को मिलाया गया एवं उससे वाक्य में परिवर्तन आया। ई एवं आ को मिलाने से या बन गया।

  • मुनींद्र : मुनि + इंद्र 

ऊपर दिए गए उदाहरण में आप देख सकते हैं इ एवं इ दो स्वरों को मिलाया गया। जब दो इ मिलीं तो एक ई बन गयी। यह परिवर्तन हुआ।

स्वर संधि के प्रकार

स्वर संधि के मुख्यतः पांच भेद होते हैं:

  1. दीर्घ संधि
  2. गुण संधि
  3. वृद्धि संधि
  4. यण संधि
  5. अयादी संधि

1. दीर्घ संधि :

संधि करते समय अगर (अ, आ) के साथ (अ, आ) हो तो ‘आ‘ बनता है, जब (इ, ई) के साथ (इ , ई) हो तो ‘ई‘ बनता है, जब (उ, ऊ) के साथ (उ ,ऊ) हो तो ‘ऊ‘ बनता है। जब ऐसा होता है तो हम इसे दीर्घ संधि कहते है। इस संधि को ह्रस्व संधि भी कहा जाता है।

उदाहरण:

  • विद्या + अभ्यास : विद्याभ्यास (आ + अ = आ)
  • परम + अर्थ : परमार्थ (अ + अ = आ)
  • कवि + ईश्वर : कवीश्वर (इ + ई = ई)
  • गिरि + ईश : गिरीश (इ + ई = ई)
  • वधु + उत्सव : वधूत्सव (उ + उ = ऊ)

2. गुण संधि

जब संधि करते समय  (अ, आ) के साथ (इ , ई) हो तो ‘ए‘ बनता है, जब (अ ,आ)के साथ (उ , ऊ) हो तो ‘ओ‘ बनता है, जब (अ, आ) के साथ (ऋ) हो तो ‘अर‘ बनता है तो यह गुण संधि कहलाती है।

उदाहरण:

  • महा + उत्सव :  महोत्सव  (आ + उ = ओ)
  • आत्मा + उत्सर्ग : आत्मोत्सर्ग (आ + उ = ओ)
  • धन + उपार्जन : धनोपार्जन (अ + उ = ओ)
  • सुर + इंद्र : सुरेन्द्र  (अ + इ = ए)
  • महा + ऋषि : महर्षि (आ + ऋ = अर)

3. वृद्धि संधि

जब संधि करते समय जब अ , आ  के साथ  ए , ऐ  हो तो ‘ ऐ ‘ बनता है और जब अ , आ  के साथ ओ , औ हो तो ‘ औ ‘ बनता है। उसे वृधि संधि कहते हैं।

उदाहरण:

  • महा + ऐश्वर्य : महैश्वर्य (आ + ऐ = ऐ)
  • महा + ओजस्वी : महौजस्वी (आ + ओ = औ)
  • परम + औषध : परमौषध (अ + औ = औ)
  • जल + ओघ : जलौघ (अ + ओ = औ)
  • महा + औषध : महौषद (आ + औ = औ)

4. यण संधि

जब संधि करते समय इ, ई के साथ कोई अन्य स्वर हो तो ‘ य ‘ बन जाता है, जब उ, ऊ के साथ कोई अन्य स्वर हो तो ‘ व् ‘ बन जाता है , जब ऋ के साथ कोई अन्य स्वर हो तो ‘ र ‘ बन जाता है।

उदाहरण :

  • अति + अधिक : अत्यधिक (इ + अ = य)
  • प्रति + अक्ष : प्रत्यक्ष (इ + अ = य)
  • प्रति + आघात : प्रत्याघात (इ + आ = या)
  • अति + अंत : अत्यंत (इ + अ = य)
  • अति + आवश्यक : अत्यावश्यक (इ + आ = या)

5. अयादि संधि-जब संधि करते समय ए , ऐ , ओ , औ के साथ कोई अन्य स्वर हो तो (ए का अय), (ऐ का आय), (ओ का अव), (औ – आव) बन जाता है। यही अयादि संधि कहलाती है।

  • उदाहरण:

    • श्री + अन : श्रवण
    • पौ + अक : पावक
    • पौ + अन : पावन
    • नै + अक : नायक

                व्यंजन संधि 

व्यंजन संधि-जब संधि करते समय व्यंजन के साथ स्वर या कोई व्यंजन के मिलने से जो रूप में परिवर्तन होता है, उसे ही व्यंजन संधि कहते हैं।
  • यानी जब दो वर्णों में संधि होती है तो उनमे से पहला यदि व्यंजन होता है और दूसरा स्वर या व्यंजन होता है तो उसे हम व्यंजन संधि कहते हैं।

व्यंजन संधि के कुछ उदाहरण :

  • दिक् + अम्बर = दिगम्बर
  • अभी + सेक = अभिषेक
  • दिक् + गज = दिग्गज
  • जगत + ईश = जगदीश

व्यंजन संधि के नियम :

व्यंजन संधि के कुल 13 नियम होते हैं जो कि निम्न है :

नियम 1:

  • जब किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) का मिलन किसी वर्ग के तीसरे या चौथे वर्ण से या (य्, र्, ल्, व्, ह) से या किसी स्वर से हो जाये तो क् को ग् , च् को ज् , ट् को ड् , त् को द् , और प् को ब् में बदल दिया जाता है।
  • अगर व्यंजन से स्वर मिलता है तो जो स्वर की मात्रा होगी वो हलन्त वर्ण में लग जाएगी।
  • लेकिन अगर व्यंजन का मिलन होता है तो वे हलन्त ही रहेंगे।

उदाहरण :

  • क् का ग् में परिवर्तन :
    • वाक् +ईश : वागीश
    • दिक् + अम्बर : दिगम्बर
    • दिक् + गज : दिग्गज
  • ट् का ड् में परिवर्तन :
    • षट् + आनन : षडानन
    • षट् + यन्त्र : षड्यन्त्र
    • षड्दर्शन : षट् + दर्शन
  • त् का द् में परिवर्तन :
    •  सत् + आशय : सदाशय
    •  तत् + अनन्तर : तदनन्तर
    •  उत् + घाटन : उद्घाटन
  • प् का ब् में परिवर्तन :
    • अप् + ज : अब्ज
    • अप् + द : अब्द आदि।

नियम 2:

  • अगर किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) का मिलन न या म वर्ण ( ङ,ञ ज, ण, न, म) के साथ हो तो क् का ङ्, च् का ज्, ट् का ण्, त् का न्, तथा प् का म् में परिवर्तन हो जाता है।

उदाहरण :

  • क् का ङ् में परिवर्तन :
    • दिक् + मण्डल : दिङ्मण्डल
    • वाक् + मय  : वाङ्मय
    • प्राक् + मुख : प्राङ्मुख
  • ट् का ण् में परिवर्तन :
    • षट् + मूर्ति : षण्मूर्ति
    • षट् + मुख : षण्मुख
    • षट् + मास : षण्मास
  • त् का न् में परिवर्तन :
  • उत् + मूलन : उन्मूलन
  • उत् + नति :  उन्नति
  • जगत् + नाथ : जगन्नाथ
  • नियम 3-
  • जब त् का मिलन ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, व से या किसी स्वर से हो तो द् बन जाता है।
  • म के साथ क से म तक के किसी भी वर्ण के मिलन पर ‘ म ‘ की जगह पर मिलन वाले वर्ण का अंतिम नासिक वर्ण बन जायेगा।
  • उदाहरण :
  • म् का (क ख ग घ ङ) के साथ मिलन :
  • सम् + कल्प : संकल्प/सटड्ढन्ल्प
  • सम् + ख्या : संख्या
  • सम् + गम : संगम
  • शम् + कर : शंकर
  • म् का (च, छ, ज, झ, ञ) के साथ मिलन :
  • सम् + जीवन : संजीवन
  • सम् + चय : संचय
  • किम् + चित् : किंचित
  • म् का (ट, ठ, ड, ढ, ण) के साथ मिलन :
  • दम् + ड : दंड
  • खम् + ड : खंड
  • म् का (त, थ, द, ध, न) के साथ मिलन :
  • सम् + देह : सन्देह
  • सम् + तोष : सन्तोष
  • किम् + नर : किन्नर
  • म् का (प, फ, ब, भ, म) के साथ मिलन :
  • सम् + पूर्ण : सम्पूर्ण
  • सम् + भव : सम्भव
  • त् का (ग , घ , ध , द , ब , भ ,य , र , व्) के उदहारण :
  • जगत् + ईश : जगदीश
  • भगवत् + भक्ति : भगवद्भक्ति
  • तत् + रूप : तद्रूपत
  • सत् + भावना = सद्भावना
  • नियम 4 :
  • त् से परे च् या छ् होने पर च, ज् या झ् होने पर ज्, ट् या ठ् होने पर ट्, ड् या ढ् होने पर ड् और ल होने पर ल् बन जाता है।
  • म् के साथ (य, र, ल, व, श, ष, स, ह) में से किसी भी वर्ण का मिलन होने पर ‘म्’ की जगह पर अनुस्वार ही लगता है।
  • उदाहरण :

    • सम् + वत् : संवत्
    • तत् + टीका : तट्टीका
    • उत् + डयन : उड्डयन
    • सम् + शय : संशय

    नियम 5:

    • जब त् का मिलन अगर श् से हो तो त् को च् और श् को छ् में बदल दिया जाता है। जब त् या द् के साथ च या छ का मिलन होता है तो त् या द् की जगह पर च् बन जाता है।

    उदाहरण:

    • उत् + शिष्ट : उच्छिष्ट
    • शरत् + चन्द्र : शरच्चन्द्र
    • उत् + छिन्न : उच्छिन्न
    • उत् + चारण : उच्चारण

    नियम 6 :

    • जब त् का मिलन ह् से हो तो त् को द् और ह् को ध् में बदल दिया जाता है। त् या द् के साथ ज या झ का मिलन होता है तब त् या द् की जगह पर ज् बन जाता है।

    उदाहरण :

    • उत् + हरण : उद्धरण
    • तत् + हित : तद्धित
    • सत् + जन : सज्जन
    • जगत् + जीवन : जगज्जीवन
    • वृहत् + झंकार : वृहज्झंकार
    • उत् + हार : उद्धार

    नियम 7:

    • स्वर के बाद अगर छ् वर्ण आ जाए तो छ् से पहले च् वर्ण बढ़ा दिया जाता है।
    • त् या द् के साथ ट या ठ का मिलन होने पर त् या द् की जगह पर ट् बन जाता है।
    • जब त् या द् के साथ ‘ड’ या ढ की मिलन होने पर त् या द् की जगह पर‘ड्’बन जाता है।

    उदाहरण:

    • आ + छादन : आच्छादन
    • संधि + छेद : संधिच्छेद
    • तत् + टीका : तट्टीका
    • वृहत् + टीका : वृहट्टीका
    • भवत् + डमरू : भवड्डमरू
    • स्व + छंद : स्वच्छंद

    नियम 8:

    • अगर म् के बाद क् से लेकर म् तक कोई व्यंजन हो तो म् अनुस्वार में बदल जाता है।
    • त् या द् के साथ जब ल का मिलन होता है तब त् या द् की जगह पर ‘ल्’ बन जाता है।

    उदाहरण :

    • तत् + लीन = तल्लीन
    • विद्युत् + लेखा = विद्युल्लेखा
    • किम् + चित = किंचित
    • उत् + लास = उल्लास

    नियम 9 :

    • म के बाद य, र, ल, व, श, ष, स, ह में से कोई एक व्यंजन हो तो म् अनुस्वार में बदल जाता है।

    उदाहरण:

    • सम् + योग : संयोग
    • सम् + हार : संहार
    • सम् + वाद : संवाद
    • सम् + शय : संशय

    नियम 10 :

    ऋ, रू या थ्रू के बाद न तथा इनके बीच में चाहे स्वर, क वर्ग, प वर्ग , अनुश्वार , य व या ह आये तो न् का ण हो जाता है।

    उदाहरण :

    • भुष + अन : भूषण
    • प्र + मान : प्रमाण
    • राम + अयन : रामायण

    नियम 11 :

    • यदि किसी शब्द का पहला वर्ण स हो तथा उसके पहले अ या आ के अलावा कोई दूसरा स्वर आये तो स के स्थान पर ष हो जाता है।

    उदाहरण:

    • अनु + सरण : अनुसरण
    • सु + सुप्ति : सुषुप्ति
    • वि + सर्ग : विसर्ग
    • नि : सिद्ध : निषिद्ध

    नियम 12 :

    • यौगिक शब्दों के अंत में यदि प्रथम शब्द का अंतिम वर्ण न हो, तो उसका लोप हो जाता है।

    उदाहरण :

    • हस्तिन + दंत : हस्तिन्दंत
    • प्राणिन + मात्र : प्राणिमात्र
    • राजन + आज्ञा : राजाज्ञा

    नियम 13 :

    जब ष के बाद त या थ रहे तो त के बदले ट और थ के बदले ठ हो जाता है। जैसे-

    • उदाहरण:

      • शिष् + त : शिष्ट
      • पृष् + थ : पृष्ठ


     

                 विसर्ग संधि

    जब संधि करते समय  विसर्ग के बाद स्वर या व्यंजन वर्ण के आने से जो विकार उत्पन्न होता है, हम उसे विसर्ग संधि कहते हैं। जैसे:

    विसर्ग संधि के उदाहरण :

    • अंतः + करण : अन्तकरण
    • अंतः + गत : अंतर्गत
    • अंतः + ध्यान : अंतर्ध्यान
    • अंतः + राष्ट्रीय : अंतर्राष्ट्रीय

    विसर्ग संधि के नियम :

    नियम 1:

    अगर कभी शब्द में विसर्ग के बाद च या छ हो तो विसर्ग श हो जाता है। ट या ठ हो तो ष तथा त् या थ हो तो स् हो जाता है। जैसे:

    उदाहरण:

    • नि: + चल : निश्चल
    • धनु: + टकार : धनुष्टकार
    • नि: + तार : निस्तार

    नियम 2:

    अगर कभी संधि के समय विसर्ग के बाद श, ष या स आये तो विसर्ग अपने मूल रूप में बना रहता है या उसके स्थान पर बाद का वर्ण हो जाता है।

    उदाहरण : 

    • नि: + संदेह : निस्संदेह
    • दू: + शासन : दुशासन

    नियम 3:

    अगर संधि के समय विसर्ग के बाद क, ख या प, फ हों तो विसर्ग में कोई विकार नहीं होता।

    उदाहरण: 

    • रज: + कण : रज:कण
    • पय: + पान : पय:पान

    नियम 4:

    अगर संधि के समय विसर्ग से पहले ‘अ’ हो और बाद में घोष व्यंजन या ह हो तो विसर्ग ओ में बदल जाता है।

    उदाहरण :

    • मनः + भाव : मनोभाव
    • यशः + दा : यशोदा

    नियम 5:

    अगर संधि के समय विसर्ग से पहले अ या आ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तथा बाद में कोई घोष वर्ण हो तो विसर्ग के स्थान र आ जाता है। जैसे: 

    उदाहरण :

    • निः + गुण : निर्गुण
    • दु: + उपयोग : दुरूपयोग

    नियम 6:

    अगर संधि के समय विसर्ग के बाद त, श या स हो तोविसर्ग के बदले श या स् हो जाता है। जैसे: 

    उदाहरण :

    • निः + संतान :  निस्संतान
    • निः + तेज़ : निस्तेज
    • दु: + शाशन : दुश्शाशन

    नियम 7:

    अगर संधि करते समय विसर्ग से पहले अ या आ हो तथा उसके बाद कोई विभिन्न स्वर हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है एवं पास-पास आये हुए स्वरों की संधि नहीं होती। जैसे:

    उदाहरण:

    • अतः + एव : अतएव

    नियम 8:

    • अंत्य के बदले भी विसर्ग होता है। यदि के आगे अघोष वर्ण आवे तो विसर्ग का कोई विकार नहीं होता और यदि उनके आगे घोष वर्ण आ जाता है तो र ज्यों का त्यों रहता है। जैसे: 

    उदाहरण:

    • पुनर् + उक्ति : पुनरुक्ति
    • अंतर् + करण : अंतःकरण

Wednesday, January 26, 2022

वर्णमाला व्यंजन

                    व्यंजन

व्यंजन  :- जो वर्ण स्वर की सहायता से बोले जाते हैं, उन्हें व्यंजन कहा जाता है। किसी वर्ण का उच्चारण करते समय हवा फेफड़ो से बाहर निकलकर जब मुख में आती है और वह रुककर अथवा किसी अवरोध के साथ बाहर निकलती है तो उसे व्यंजन  कहा जाता है।

 व्यंजन के भेद कितने होते हैं। – 

1 . स्पर्श व्यंजन (25)

2 . अंतःस्थ (4)

3 . उष्म (4)

4 . उत्तिक्षप्त (2)

 

1 . स्पर्श व्यंजन-जो व्यंजन कंठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ आदि स्थानों के स्पर्श से बोले जाते हैं, वे स्पर्श व्यंजन कहलाते हैं। इनको वर्गीय व्यंजन भी कहा जाता है। ‘क’ से लेकर ‘म’ तक के वर्ण स्पर्श व्यंजन कहलाते हैं।

य्, व्’ का उच्चारण न तो पूर्ण स्वर की तरह होता हैं और न ही पूर्ण व्यंजन की तरह होता हैं, अतः इन्हें “अर्द्ध स्वर” भी कहा जाता है।

3 . ऊष्म व्यंजन- जिनके  उच्चारण किसी रगड़ या घर्सन से उत्पन ऊष्मा वायु से होता हैं, वे ऊष्म व्यंजन कहलाते हैं।जैसे- श्, ष्, स्, ह्


4 . उत्तिक्षप्त व्यंजन-व्यंजन स्वर रहित होते हैं। जैसे क्, प्, त् आदि। जब इनमें अ स्वर मिलता है तब इनका हलन्त मिट जाता है और ये क्रमशः क, प, त रूप में आते हैं। शब्द का निर्माण स्वर और व्यंजन के मेल से ही होता है।जैसे-ड़, ढ़।


उच्चारण के समय स्वर-तंत्रियों में कम्पन के आधार पर भेद-उच्चारण के समय स्वर-तंत्रियों में कम्पन के आधार पर हिंदी वर्णमाला के निम्न दो भेद होते हैं -

1. अघोष

2 . सघोष

1 . अघोष व्यंजन-जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर-तंत्रियों में कम्पन नहीं होता है, उन्हें ‘अघोष’ कहते हैं। इनमें प्रत्येक वर्ग का प्रथम व् द्वितीय वर्ण एवं श्, ष्, स्, शामिल हैं।

 

2 . सघोष व्यंजन -जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर-तंत्रियों में कम्पन होता है, उन्हें ‘सघोष’ कहते हैं। सघोष ध्वनियों का उच्चारण करते समय यदि कण्ठ पर हाथ रख कर देखें तो कम्पन का आभास होगा। इनमें अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ (सभी स्वर), प्रत्येक वर्ग का तृतीय, चतुर्थ एवं पंचम वर्ण एवं य्, र्, ल्, व्, ह् शामिल हैं।

संयुक्त व्यंजन - जो व्यंजन 2 या 2 से अधिक व्यंजनों के मिलने से बनते हैं उन्हें संयुक्त व्यंजन कहा जाता है। संयुक्त व्यंजन एक तरह से व्यंजन का ही एक प्रकार है। संयुक्त व्यंजन में जो पहला व्यंजन होता है वो हमेशा स्वर रहित होता है और इसके विपरीत दूसरा व्यंजन हमेशा स्वर सहित होता है।

संयुक्त व्यंजन की हिंदी वर्णमाला में कुल संख्या 4 है जो की निम्नलिखित हैं।

क्ष - क् + ष = क्ष

त्र - त् + र = त्र

ज्ञ - ज् + ञ = ज्ञ

श्र - श् + र = श्र

प्राणत्व के आधार पर- इसे दो भागों में बांटा गया है
1- अल्पप्राण- जिन व्यंजनों के उच्चारण में मुख से कम हवा निकलती है उसे अल्पप्राण कहते हैं हर वर्ग का पहला तीसरा पांचवा व्यंजन अल्पप्राण है अंतस्थ व्यंजन अल्पप्राण के अंतर्गत आते हैं! 
2- महाप्राण- जिन व्यंजनों के उच्चारण में मुख से हवा अधिक निकलती है उन्हें महाप्राण वर्ण कहते हैं हर वर्ग का दूसरा व चौथा व्यंजन प्रथा संघर्षी व्यंजन महाप्राण की श्रेणी में आते हैं! 
 महत्वपूर्ण चित्र अध्ययन-

Sunday, January 23, 2022

कार्तिकेय पुर राजवंश

                 कार्तिकेयपुर राजवंश
उत्तराखंड के इतिहास का पहला ऐतिहासिक राजवंश इसे ही माना जाता है इसका समयावधि लगभग 700 ई. से 1100 ई. का माना जाता है! इस वंश के अंतर्गत तीन परिवार आते थे! जिसमें 14 राजाओं ने शासन किया था! 
प्रथम परिवार (बसंत देव राजवंश) 
द्वितीय परिवार (निम्बर देव राजवंश) 
तृतीय परिवहन (सलोणादित्य राजवंश) 

कार्तिकेयपुर राजवंश का मूल स्थान- इतिहासकार लक्ष्मीधर जोशी और बद्री दत्त पांडे के अनुसार यह अयोध्या के सूर्यवंशी थे! उत्तराखंड में मूल कार्तिकेय पुर का स्थान जोशीमठ चमोली माना जाता है किंतु तो यह भी संभव है कि कार्तिकेयपुर  मूल रूप से वर्तमान कार्तिकेय मंदिर क्षेत्र रुद्रप्रयाग भी हो सकता है कार्तिकेयपुर राज्य इष्ट देवता कार्तिकेय स्वामी थे ताम्रपत्र से स्पष्ट होता है कि  कत्युरी शासकों की राजभाषा संस्कृति तथा लोकभाषा संभवत प्राकृति थी! 

प्रथम शाखा  (बसंतदेव राजवंश)-
1- बसंतदेव- यह कन्नौज के राजा यशोवर्मन का सामंत था! जो ललितादित्य मुक्तापीड के आक्रमण के बाद स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर देता है और बसंत देव राजवंश की स्थापना करते हैं  इतने जोशीमठ के पास कार्तिकेयपूर को अपनी राजधानी बनाया इस वंश की जानकारी बागेश्वर शिलालेख से मिलती है बागेश्वर से प्राप्त त्रिभुवन राज के शिलालेख से पता चलता है कि इस वंश का संस्थापक बसंत देव था
बागेश्वर अभिलेख से यह पता चलता है कि बसंत देव ने शरणेश्वर ग्राम में वैष्णवों को भूमि दान दी थी इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी और जोशीमठ में नरसिंह मंदिर व बागेश्वर के मंदिरों का निर्माण करें बागेश्वर अभिलेख  मैं इसकी पत्नी का नाम सज्यनारा मिलता है यह शैव धर्म को मानता था! 
Note- कुछ किताबों में बसंत देव की पत्नी राज नारायणी देवी उत्तीर्ण है! 
बसंत देव के बाद के राजा का नाम वर्णन नहीं है उसके बाद खर्परदेव का नाम आता है! 
2- खर्परदेव- इसकी पत्नी का नाम कल्याणी देवी था इसने भी परमभट्ठारक महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी  इसके बाद इसका पुत्र कल्याण राज अर्थात अधिधज राजा बना! 

3- कल्याण राज- उसकी पत्नी का नाम लद्धा देवी था! उसके बाद त्रिभुवन राज गद्दी में बैठा! 

4- त्रिभुवन राज- बसंत देव के समान त्रिभुवन महाराजाधिराज परमेश्वर तथा परमभट्ठारक की उपाधि धारण की थी  त्रिभुवन राज अपने दानवीर प्रगति के लिए जाना जाता था इसने कई मंदिरों के लिए भूमि दान की थी यह इस वंशिका अंतिम राजा था इसलिए किरातों तथा शोखा जनजाति से मैत्री संबंध स्थापित किए थे इसके किरात मित्र द्वारा गंवियपिंड देवता को  ढाई द्रोण दान दिए जाने का जिक्र भी प्राप्त होता है! 
नालंदा अभिलेख से पता चलता है कि धर्मपाल ने त्रिभुवनराज के समय उत्तराखंड में आक्रमण किया और इस समय का फायदा उठाते हुए निम्बर राजवंश ने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की! 

👉 द्वितीय परिवार (निम्बर राजवंश)-
राजा निम्बर- पांडुकेश्वर ताम्रपत्र तथा बागेश्वर शिलालेखों से इस वंश के राजाओ की जानकारी मिलती है! 
राजा निम्बर इस राजवंश का स्थापक था जो शैव  का अनुयाई था! और भगवती नंदा का आराधक था! 
इसकी पत्नी का नाम दाशु या नाथु देवी था! उसके पुत्र का नाम इष्टगण था! 
Note-
निम्बर को  पांडुकेश्वर ताम्रपत्रों मे श्री निम्वरम् तथा बागेश्वर शिलालेख मे निंबर्त कहा है! 
ललितसुर देव के ताम्रपत्रों में उसकी प्रशंसा की गई है! 

इष्टगण- यह पहला शासक था जिसने संपूर्ण उत्तराखंड को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया  इसने परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की  इसकी पत्नियों के नाम वेगादेवी और धरा देवी मिलता है!  धरा देवी  के पुत्र का नाम ललितसूर देव था जो बाद में राजा बनता है इसके ताम्र अभिलेखों में इष्टगण को परममाहेश्वर और परम ब्राह्मण कहा गया है! 
 Note- इसने तराई भाबर क्षेत्र में शत्रु को हराया था! 
इसने जागेश्वर में नव दुर्गा मंदिर,लवलीश  मंदिर तथा नटराज मंदिर का निर्माण कराया था! 

 ललितसुर देव- यह 832ई.में गद्दी में बैठा इसने अपने पिता की भांति परम भट्ठारक महाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की! 
की अन्य उपाधि परममाहेश्वर तथा  परम ब्राह्मण थी! 
पांडुकेश्वर से इसके दो ताम्र अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिसमें इसे वाराहअवतार के सामान बताएं! 
इस की दो पत्नियां थी लया देवी और सामा देवी थी! सामा देवी के पुत्र का नाम  भूदेव था जो इसके बाद राजा बनता है! 
Note- बागेश्वर में बैजनाथ मंदिर का निर्माण भूदेव ने कराया परंतु यहां नारायण मंदिर का निर्माण सामा देवी ने कराया! 

भूदेव- यह कट्टर ब्राह्मण धर्मावलम्बी था  इसकी उपाधि परम भट्ठारक महाराजअधिराज परमेश्वर,  परम ब्राह्मण भक्त तथा बुद्ध श्रवण शत्रु थी! 
इसने बागेश्वर में शिलालेख उत्तीर्ण कराया था  इस वंश की राजधानी बागेश्वर की गरुड़ घाटी एवं कार्तिकेयपुर दोनों थी!  
इसके बाद सलोणादित्य वंश का उदय हुआ! 

सलोणादित्य वंश- इस वंश की जानकारी हमें पांडुकेश्वर ताम्रपत्र तथा देशटदेव के बालेश्वर ताम्रपत्र  से पता चलती है! इस वंश का पहला शासक सलोणादित्य था! 
सलोणादित्य- इसकी पत्नी का नाम सिंधवली देवी था  इसे अभिलेखों में भानुदित्य की भांति स्वभुजा से राज्य प्राप्त करने वाला शासक कहा गया है! 

इच्छटदेव- सलोणादित्य के पुत्र पदमटदेव के ताम्रपत्र में इसे ब्राह्मण भक्त शासक कहां है इसकी रानी का नाम सिंधु देवी था इसका राज्य वर्तमान चंपावत पिथौरागढ़ क्षेत्र तक विस्तृत था! 

देशटदेव- ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि इसने अपने शासन के 5 वर्ष विजयेश्वर मंदिर को एशाल विषय के अंतर्गत यमुना नामक ग्राम अग्रहार के रूप में दिया! यह राजा दीन दुखियों का रक्षक एवं स्वर्ण दानदाता के नाम से भी जाना जाता है! इसकी पत्नी का नाम पझल्ल देवी था इन के पुत्र का नाम पदम देव था जो देशटदेव  के बाद राजा बनता है! 

Note-  देशटदेव  का चंपावत के बालेश्वर मंदिर में ताम्रपत्र है जिसमें किसी शत्रु के प्रयास को विफल बनाने वाला कहा गया है! 

पद्मदेव- इसका ताम्रपत्र पांडुकेश्वर से प्राप्त हुआ जिससे हमें पता चलता है कि इसने 25 वर्ष से अधिक दान किया तथा अपने शासन के 25 वर्ष बद्रीनाथ मंदिर के नाम पर भूमि दान की इसके बाद का पुत्र सुभिक्षराज गद्दी में बैठता है! सुमिक्षराज के ताम्रपत्र में इसे  परम माहेश्वर,ब्राह्मण भक्त एवं सूर्य के समान प्रकाशवान, कर्ण, दधीचि, चंद्रगुप्त से अधिक दानदाता कहा गया है! 

सुभिक्षराज - इसे वैष्णव तथा परम ब्राह्मण का जाता है यह शास्त्रों के अनुसार शासन करने वाला शासक था इसने सुभिक्षपुर नामक नगर बताया और इसे अपनी राजधानी बनाया! यह कार्तिकेयपुर राजवंश का अंतिम शासक था

 Note- जागरों एवं पवांडो के अनुसार सुभिक्षराज के पुत्र नरसिंह के द्वारा कार्तिकेयपुर से बैजनाथ यानी कत्यूरी घाटी राजधानी  स्थानांतरित की! 






वर्णमाला

                  वर्णमाला का परिचय
अभिव्यक्ति की सार्थक लघुत्तम वाक् ध्वनि को वर्ण कहते हैंl
Important-
👉 भाषा की सबसे छोटी मौखिक इकाई ध्वनि है! 
👉 भाषा की सार्थक लघुतम इकाई शब्द कहलाती है! 
👉 पद की सबसे छोटी इकाई अक्षर है! 
👉 भाषा की सार्थक इकाई वाक्य है! 
वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैंl
हिंदी वर्णमाला-
हिंदी वर्णमाला में कुल वर्ण 52 है है परंतु इनकी मूल संख्या 44 है इसमें स्वरों की मूल संख्या 11 व व्यंजनों की मूल संख्या 33 हैl
Note- स्वर की संख्या 11 तथा व्यंजनों की कुल संख्या 39 और दो अयोगवाह वर्ण (अं,अ:) होते हैं इनको मिलाकर कुल वर्णमाला मे वर्णों की संख्या 52 होती है! 

                           वर्ण के भेद
हिंदी वर्णमाला में वर्णों के दो भेद होते हैं-
स्वर वर्ण
व्यंजन वर्ण

स्वर वर्ण- जिनका अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है और बोलने में कम समय लगता है उन्हें स्वर कहते हैं!
 
Note- वर्ण के उच्चारण में लगने वाले समय को मात्रा कहते हैं 'अ' को छोड़कर प्रत्येक स्वर की मात्रा होती है! 

स्वर के मुख्यतः तीन भेद होते हैं-
ह्रस्व स्वर/लघु स्वर/मूल स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगे उन्हें मूल स्वर कहते हैं! 
यह चार प्रकार के होते हैं- अ,इ,उ, ऋ
नोट- वर्ण के उच्चारण में लगने वाले समय को मात्रा कहते हैं! 
'ऋ' लिखने की दृष्टि से स्वर है परंतु उच्चारण की दृष्टि से व्यंजन है! 

दीर्घ स्वर/संयुक्त स्वर- जिन स्वरो के उच्चारण में मूल स्वर से दुगना समय लगे उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं ये 7 प्रकार के होते हैं-
आ- अ/आ+अ/आ
ई- इ/ई+इ/ई
ऊ-उ/ऊ+उ/ऊ
ए- अ/आ+इ/ई
ऐ-अ/आ+ए/ऐ
ओ- अ/आ+उ/ऊ
औ- अ/आ+ओ/औ
Note- ए,ओ  को शुद्ध संयुक्त स्वर कहते हैं! 

3- प्लुत स्वर- वे स्वर जिनके उच्चारण में मूल स्वर से समय लगे  और नाटक की व्यंग के लिए प्रयोग किया जाए- ओऊम (ॐ) 

स्वर के अन्य प्रकार-
👉 जीभ  की क्रियाशीलता के आधार- इसके स्वर तीन प्रकार के होते है-

1-अग्र स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का अग्रभाग सक्रिय होता हो वह अग्रस्वर कहलाते है! 
यह चार प्रकार के होते हैं- इ,ई, ए,ऐ

2-मध्य स्वर- जिन स्वरो के उच्चारण में जीभ का मध्य भाग सक्रिय होता है उन्हें मध्य स्वर कहते हैं- अ

3-पश्च स्वर- वे स्वर जिनके के उच्चारण में जीभ का पश्च भाग सक्रिय होता हो उन्हें पश्च स्वर कहते हैं- आ, उ, ऊ, ओ, औ, ऑ

Note- 'ऑ' का प्रयोग अंग्रेजी शब्दों के लिए किया जाता है- कॉलेज डॉक्टर इत्यादि

👉ओष्ठों के गोलाई के आधार पर- होठों/ओष्ठों की गोलाई के आधार पर स्वरो  को दो भागों में बांटा गया-
1- व्रत्तमूखी  स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में होठों का आकार गोलाकार होता है उन्हें व्रत्तमूखी या वृत्ताकार स्वर कहते हैं- उ, ऊ, ओ, औ, ऑ

2-अव्रत्तमुखी स्वर- जिन स्वरो के उच्चारण मे होठों का आकार वृत्ताकार ना हो उन्हें अव्रत्तमुखी या अव्रत्तमुखी स्वर कहते है- अ, आ, इ, ई, ए, ऐ

👉मुखाकृति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण-

1. संवृत स्वर-संवृत स्वर के उच्चारण में मुख द्वार सकरा हो जाता है। ये संख्या में चार होते है - इ , ई , उ , ऊ 

2. अर्द्ध संवृत स्वर -अर्द्ध संवृत स्वर के उच्चारण में मुख द्वार कम सकरा होता है। ये संख्या में 2 होते है - ए , ओ 

3. विवृत स्वर-विवृत स्वर के उच्चारण में मुख द्वार पूरा खुला होता है। ये संख्या में 2 है - आ , आँ 

4. अर्द्ध विवृत स्वर-अर्द्ध विवृत स्वर के उच्चारण में मुख द्वार अधखुला होता है। ये संख्या में 4 होते है - अ , ऐ , औ , ऑ


👉 हवा के मुंह या नाक से निकलने के आधार पर- हवा के मुंह या नाक से निकलने के आधार पर स्वरों को दो भागों में बांटा गया! 
1-अनुनासिक स्वर-  जिन  स्वरो  के उच्चारण में वायु मुख के साथ-साथ नाक से बाहर निकलती है उन्हें अनुनासिक स्वर कहते हैं अनुनासिक स्वरूप को चंद्रबिंदु लगाकर दिखाया जाता है- जैसे- अँ,एँ, 
अन्य उदाहरण शब्द रूप - अंधेरा आंखें ऊँट

2- निरनुनासिक- जिन स्वरों के उच्चारण में धोनी केवल मुख से बाहर निकलती है अर्थात वर्णमाला के 11 स्वर निरनुनासिक के अंतर्गत आते हैं! 
जैसे- अ,आ, ई....... .............. ओ, औ

👉 जाति के आधार पर स्वर- जाति के आधार पर स्वरों को दो भागों में बांटा गया-
1-सवर्ण/सजातीय स्वर- जिन  स्वरूप का उच्चारण समाधि स्थान और समान प्रयत्न से हो सवर्ण स्वर कहलाते हैं- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ
2-असवर्ण/विजातीय स्वर- वे स्वर जिन का उच्चारण स्थान अलग और प्रयत्न भी अलग असवर्ण स्वर कहलाते हैं- ए, ऐ, ओ, और

👉 उच्चारण स्थान के आधार पर स्वर- स्वरों के उच्चारण के समय जीह्वा मुख के विभिन्न भागो को स्पर्श करती है इस आधार पर इनका वर्गीकरण निम्न है-
(1) कण्ठय् स्वर – अ, आ, अः
(2) तालव्य स्वर – इ, ई
(3) मूर्धन्य स्वर – ऋ
(4) ओष्ठम स्वर – उ, ऊ
(5) कण्ठ तालव्य स्वर – ए, ऐ
(6) कण्ठ ओष्ठ स्वर – ओ, औ
(7) नासिक्य स्वर – अं
👉नोट- अं,अ: अयोगवाह वर्ण होते हैं अं को  अनुस्वार और अ: को विसर्ग कहते है! इनको स्वरों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है! 
👉 सभी स्वर सघोष तथा अल्पप्राण होते हैं! 
Note-  सघोष का अर्थ होता है जिन्हें बोलने में   कंपन उत्पन्न हो और अल्पप्राण में होता है  जिनके उच्चारण करने पर हुआ मुख से कम बाहर निकले ! 


                                 व्यंजन

लेखन जारी है........... 



Saturday, January 22, 2022

देवनागरी लिपि का विकास और गुण तथा दोष

                    देवनागरी लिपि
प्राचीन काल में सिंधु लिपि खरोष्ठी लिपि तथा ब्राह्मी लिपि थी ब्राह्मी लिपि की दो शैली थी दक्षिणी शैली तथा उत्तरी शैली! 
उत्तरी शैली से गुप्त लिपि का विकास हुआ है और  गुप्त लिपि से सिद्धमात्रिका लिपि (कुटिका लिपि) और सिद्धमात्रिका  लिपि से देवनागरी तथा शारदा लिपि का विकास हुआ! 

देवनागरी लिपि का नामकरण-
नागलिपि से- ललिता विस्तार  में नाग लिपि की चर्चा की गई है कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इसी नाग लिपि से नागरी लिपि का जन्म हुआ है! 
नगर से- कुछ विद्वानों का मत है कि यह लिपि नगरों में विकसित हुई इसलिए इसे नागरी लिपि कहते हैं! 
नागर ब्राह्मण से- देवनागरी लिपि का पहला साक्षी गुजरात के राजा जय भट्ट के अभिलेखों  में मिलता है और गुजरात के नागर ब्राह्मण के कारण इसे नागरी लिपि कहा जाता है! 
नागर व देव से- कुछ इतिहासकारों का मानना है कि चंद्रगुप्त को देव तथा पाटलिपुत्र को नगर कहा जाता था इसका विकास यहीं से हुआ है इसलिए इसका नाम देवनागरि पड़ा! 
स्थापत्य शैली नाम पर- डॉक्टर धीरेंद्र वर्मा के अनुसार मध्यकाल में स्थापत्य इस शैली नागर शैली थी जिस कारण इसका नाम नागर शैली के कारण पड़ा! 

देवनागरी लिपि का विकास- 
1- फोर्ट विलियम कॉलेज अध्यक्ष जॉन गिलक्राइस्ट देवनागरी लिपि के विरोधी थे तथा वह फारसी लिपि को प्रोत्साहन देना चाहते थे और हिंदी के स्थान पर हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग करना चाहते हैं परंतु विलियन प्राइम ने 1813 में फारसी के स्थान में देवनागरी तथा हिंदुस्तानी के स्थान पर हिंदी भाषा को प्रोत्साहन देने की बात की! 

2- राजा सितारे हिंद ने 1868 में फारसी के स्थान पर देवनागरी लिपि का प्रयोग करने के लिए  अहम भूमिका निभाई! 

3- पंडित गौरी दत्त जी ने 874 में नागरिक प्रकाश पत्र निकाला जिसने देवनागरी के विकास और सुधार में अहम भूमिका निभाई! 

4- 1893 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की तथा कचहरी भाषा में फारसी लिपि के  स्थान में देवनागरी लिपि के प्रयोग की बात की जो 1898 में सफल हुई

5- 1928 में नेहरू समिति ने रिपोर्ट दी और कहा देवनागरी लिपि तथा फारसी लिपि मिश्रित हिंदुस्तानी भाषा देश की राज्य भाषा होगी! 

6- संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को  अनुच्छेद 343(1) के अनुसार संस्कृत मिश्रित खड़ी बोली से विकसित हिंदी भाषा भारत की राजभाषा होगी जो देवनागरी लिपि  लिखी जाएगी! 

देवनागरी लिपि के गुण-
👉यह बाएं से दाएं लिखी जाने वाली अक्षरात्मक लिपि है जिसका विकास वर्णनात्मक लिपि से हुआ है! 
👉 प्रत्येक ध्वनि के अलग वर्णों की व्यवस्था है  और ध्वनि का नाम ही वर्ण का नाम है अर्थात हर वर्ण अपनी स्वतंत्र ध्वनि रखता है! 
👉 इसमें मुक वर्ण नहीं होता है  एक वर्ण में दूसरे का भ्रम नहीं होता है! 
👉 राहुल सांकृत्यायन के अनुसार यह दुनिया की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है! 
👉 देवनागरी लिपि का व्यापक प्रयोग किया जाता है संस्कृत हिंदी नेपाली मराठी इत्यादि  भाषाएं देवनागरी लिपि के अंतर्गत आती हैl

देवनागरी लिपि की कमियां-
👉 मुद्रण में कठिनाई क्योंकि इसमें टाइप/अक्षर बहुत अधिक हैl
👉 मात्राओं का प्रयोग दाएं बाएं ऊपर नीचे होता हैl
👉 त्वरालेखन  का अभाव बहुत अधिक दिखता है l
👉 कुछ ऐसी दुनिया है जिनके चिन्ह एक से अधिक होते हैं जैसे-   'र'   की मात्रा
👉 कुछ वर्ण भ्रम की स्थिति पैदा करते है जैसे ख,रव

व्यक्तिगत रूप से देवनागरी लिपि में सुधार के प्रयास-
👉 1964 में बाल गंगाधर तिलक ने तिलक फाण्ट का निर्माण किया इसका प्रयोग उन्होंने केसरी नामक पत्रिका में किया इन्होनें 403 टाइप को 190 टाइप मे बदला! 
👉 सावरकर बंधु अ की बारघड़ी लाए- अ आ अ्इ.....  जिसका प्रयोग हरिजन सेवक नामक पत्रिका में महात्मा गांधी ने किया! 
👉 श्यामसुंदर बजाज ने पंचमाक्षर के स्थान में अनुस्वार का प्रयोग को प्राथमिकता दी-
गंड्गा 👉 गंगा

विभिन्न संस्थानों द्वारा देवनागरी के विकास में किए गए कार्य-
👉 1935 में हिंदी साहित्य सम्मेलन इंदौर में हुआ इसके संयोजक काकासाहेब कालेकर व अध्यक्ष  महात्मा गांधी थे इस समिति ने नागरी  लिपि सुधार समिति की स्थापना की! 
👉 आचार्य नरेंद्र देव ने 21 जुलाई 1947 को नागरी लिपि सुधार परिषद का गठन किया जिसने अपने रिपोर्ट 25 मई 1949 को दिए 1953 में इस समिति की अध्यक्षता डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कि यह सम्मेलन लखनऊ में हुआ! 
❤ सुमिति कुमार चटर्जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने देवनागरी लिपि की जगह रोमन लिपि का प्रयोग को प्राथमिकता दी✌

हर्ष के पश्चात उत्तराखंड की स्थिति

              हर्ष के पश्चात मध्य हिमालय
हर्ष के  पश्चात हिमालय क्षेत्र बरहमपुर शत्रुघ्न और गोविषाण राज्य में टूट गया इनमें सबसे बड़ा राज्य बरहमपुर राज्य था! 
                       ब्रह्मपुर राज्य
यह राज्य गंगा से लेकर करनाली नदी तक फैला हुआ था यह राज्य पौरव राजवंश के अधीन था! इनका शासन यहां 6वि सदी से आठवीं सदी तक रहा यह राजा सोनवंशी राजा थे! 1915 में अल्मोड़ा के तारकेश्वर से  इस वंश का ताम्रपत्र मिला जिसमें धुतिवर्मन, विषणुवर्मन, विषवर्मन, अग्निवर्मन धुतिवर्मन  के नामों का वर्णन है! यह राजा महाराजा अधीराज परम भट्ठारक की उपाधि लेते थे इनके कुलदेवता विरणेश्वर स्वामी थे! 
बरहमपुर राज्य को इंद्र की राजधानी और नगरों में श्रेष्ठ के रूप में जाना जाता है तामपत्रो मे इसकी राजधानी तालकेश्वर छेत्र मानी जाती है ! 
 Note-
पर्वताकार वंश के अभिलेखों की भाषा संस्कृत भाषा तथा लिपि गुप्त ब्राह्मी लिपि थी इनके ताम्रपत्र के साथ एक अंडाकार मुद्रा जोड़ी थी जिसमें वृषभ मकर और गरुड़  के चित्र अंकित थे  इन मुद्राओं में संस्कृत भाषा तथा कुटिला लिपि अंकित थीl
इनके शासकों के निवास स्थान को कोट कहा जाता था
पौरव शासकों के आय का मुख्य स्त्रोत भूमि कर था जिसे भाग कहा जाता था इसे वसूल करने वाले अधिकारी को मार्गक कहा जाता था
इस वंश में सिंचित क्षेत्र को केदार तथा गैर सिंचित क्षेत्र को सारी कहा जाता था! 
भूमि माप के लिए द्रोणवाप
खारीवाप और कुल्यावाप विधि का प्रयोग किया जाता है! 

                       शत्रुघ्न राज्य
हवेनसांग के अनुसार इस राज्य की पूर्वी सीमा गंगा व उत्तर में हिमालय और राज्य के मध्य से यमुना नदी बहती थी लेकिन कनिंघम के अनुसार यह राज्य सिरमौर का हिस्सा था! 

                        गोविषाण
इसे वर्तमान में काशीपुर के नाम से जाना जाता है कनिंघम के अनुसार गोविषाण  राज्य में काशीपुर के साथ-साथ रामपुर और पीलीभीत जनपद भी थे इसका विस्तार रामगंगा से लेकर शारदा तक था ! 

कंप्यूटर विज्ञान

                      कंप्यूटर विज्ञान
कंप्यूटर एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक्स डिवाइस है  जो इनपुट प्राप्त करके उसे प्रोसेस करता है तथा सूचना प्राप्त करने के लिए आवश्यक निर्देशों का पालन करता है! 
चार्ल्स बैबेज को आधुनिक  कंप्यूटर का सर्वप्रथम विचार देने के कारण कंप्यूटर का पिता कहा जाता है! 
1937 ईस्वी में मार्क-1 नाम के प्रथम के  कंप्यूटर का निर्माण किया गया! 
भारत में कंप्यूटर का विकास 1955 स्पीच से प्रारंभ हुआ परंतु 1984 ईस्वी में जाकर ही इसे पर्याप्त महत्व मिला! 
1998 ईस्वी में भारत ने सुपर कंप्यूटर परम 1000 का विकास कर संपूर्ण विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया! 
कंप्यूटर मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं;-
1-माइक्रो कंप्यूटर 
2-सुपर कंप्यूटर 
3-मेनफ्रेम कंप्यूटर 
4-मिनी कंप्यूटर

1- माइक्रो कंप्यूटर- यह सबसे कम शक्तिशाली किंतु सबसे अधिक प्रचलित कंप्यूटर है कंप्यूटरों में सर्वाधिक प्रयोग इन्हीं का होता है यह चार प्रकार के होते हैं डेस्कटॉप ,नोटबुक, टेबलेट पीसी और हैंडहेल्ड कंप्यूटर
हैंडहेल्ड कंप्यूटर को पामटॉप कंप्यूटर भी कहते हैं! 

2- सुपर कंप्यूटर- यह सबसे शक्तिशाली कंप्यूटर होता है इनका  स्मृति भंडार 52 मेगाबाइट से अधिक होता है और यह 500 एम फ्लाप की क्षमता से कार्य करते हैं परम-10000 स्तर का सुपर कंप्यूटर एशिया में भारत के अतिरिक्त मात्र जापान के पास है! 

3- मेनफ्रेम कंप्यूटर- यह विशेष रूप से बने वातानुकूलित कमरे में रखे जाते हैं यह सुपर कंप्यूटर की तरह शक्तिशाली नहीं होते हैं लेकिन इनकी प्रोसेसिंग की गति एवं भंडारण क्षमता बहुत अधिक होती है बीमा कंपनी तथा अन्य प्रकार की कंपनी में इनका प्रयोग किया जाता है! 

4- मिनी कंप्यूटर- इन्हें मिडरेंज कंप्यूटर भी कहा जाता है इनका आकार रेफ्रिजरेटर के बराबर होता है इनका प्रयोग मुख्यतः  बड़ी कंपनियों में होता है! 

कार्य पद्धति के आधार पर कंप्यूटर के पांच प्रकार होते है-
अंकीय कंप्यूटर 
शंकर कंप्यूटर 
अनुरूप कंप्यूटर 
प्रकाशीय कंप्यूटर 
आणविक कंप्यूटर

कंप्यूटर दो पद्धतियों में कार्य करता है पहले तो इसके निर्माण यंत्रों एवं उपकरणों से होता है तथा फिर उसके संचालन के लिए विभिन्न प्रकार के प्रोग्रामों का निर्माण किया जाता है इस आधार पर कंप्यूटर की दो पद्धतियां हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर

लेखन जारी है......