Saturday, March 19, 2022

वैदिक सभ्यता( भारतीय से भाग 4)

                    🌟 वैदिक सभ्यता 🌟
इस सभ्यता का समय काल 1500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व तथा इसे दो भागों में बांटा जाता है! 
1- ऋग्वैदिक काल(1500-1000 ईसा पूर्व) 
2- उत्तर वैदिक काल(1000-600 ईसा पूर्व) 
Note- वैदिक सभ्यता की स्थापना का श्रेय आर्यो को जाता है  इस शब्द का अर्थ श्रेष्ठ उत्तम अभिजात कुलीन होता है! 
✴️1853 मैक्समूलर ने आर्य जाति को श्रेष्ठ जाति कहकर संबोधित किया उसने कहा कि यह मध्य एशिया से भारत आए थे! 
✴️ एक समान भाषा बोलने वालों को भी आर्य कहा जाता है तथा  इंडो-यूरोपियन भाषा बोलने वाले समूह को भी आर्य कहते हैं! 
🟠 मूल स्थान से संबंधित मत-
1- मध्य एशिया या बैक्टीरिया से संबंधित मत-जर्मन विद्वान मैक्स मूलर ने देखा कि इरानी ग्रंथ जेन्द अवेस्ता से इस सभ्यता की कई बातें मिलती है! अतः आर्य  मुल रूप से मध्य एशिया के निवासी थे यहां एक प्रमाणित मत है! 
2- उत्तर ध्रुव से संबंधित मत- बाल गंगाधर तिलक ने अपनी पुस्तक द ऑर्थोटिक होम आफ आर्यन मे आर्यों को उत्तरी ध्रुव का मूल निवासी माना है! 
3- तिब्बत संबंधित मत- दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में इन्हें तिब्बत से संबंधित बताएं! 
4- सप्तसैंधव क्षेत्र- अविनाश चंद ने आर्यो को सप्तसिंधु क्षेत्र का बताया है! 
🟠आर्यो के जानकारी के साधन-
1- बोगजकोई अभिलेख- यह विश्व का सबसे प्राचीन अभिलेख है जो ईरान से प्राप्त हुआ इसे एशिया माइनर अभिलेख भी कहते हैं इसमें ऋग्वेद के देवता इंद्र वरुण मित्र नासत्य का वर्णन मिलता है! 
Note- भारत में सबसे प्राचीन अभिलेख अशोक के अभिलेख है! 
2- वेद-  वे शब्द विद धातु से बना है जिसका अर्थ होता है जानना या ज्ञान प्राप्त करना था इसके संकलनकर्ता महर्षि वेदव्यास जी थे इसकी उपनाम श्रुति ग्रंथ साहित्य ग्रंथ और अपौरुषेय ग्रंथ है! 
Note- श्रुति ग्रंथ- सुनकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जान पहुंचाएं अर्थात गुरु शिष्य परंपरा
अपौरुषेय ग्रंथ- देवताओं द्वारा रचित ग्रंथ
महत्वपूर्ण- ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद को वेदत्रेयी कहा जाता है! 
वेदों के प्रकार- वे चार प्रकार के होते हैं! 
1- ऋग्वेद- 
सबसे प्राचीन वेद है! 
इसको पढ़ने वाले को होर्त या होता कहा जाता है! इसका उपवेद आयुर्वेद है!जिसके रचनाकार प्रजापति है! 
इसमें 10 मंडल 1028 सूक्त और 10462 मंत्र है! 
इसके ब्राह्मण ग्रंथ ऐतरैय व कोषीतकी  है!
इसमें पहला आठवां नौवां और दसवां मंडल बाद में जोड़ा गया! 
इसमें सबसे पवित्र नदी सरस्वती है! 
चौथे मंडल में कृषि का वर्णन है! 
तीसरे मंडल में गायत्री मंत्र है! 
दसवीं मंडल में चतुर्वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है! 
इसमें नवे मंडल में सोम देवता का वर्णन है! 
इसमें साथ में मंडल में दसराज युद्ध का वर्णन है! 
असतो मा सद्गमय वाक्य भी इसी वेद से लिया गया

2- सामवेद-
भारत में संगीत का जनक किसी वेद को कहा जाता है! 
इसको पढ़ने वाले को उद्रगाता  कहा जाता है! 
इसका उपयोग गंधर्व वेद है जिसकी रचना महर्षि नारद ने की है! 
इसका ब्राह्मण ग्रंथ पंचवीस है जिसके रचनाकार जैमिनी है! 
इसमें मूल मंत्र 75 है! 
3- यजुर्वेद-
यजु का अर्थ होता है- यज्ञ से
इसमें गद्य तथा पद्य दोनों है अर्थात यह चम्पू शैली का वेद है! 
इसको पढ़ने वाले को अध्वर्यु कहा जाता है! 
किस वेद में हाथी पालन का वर्णन भी मिलता है! 
यह दो प्रकार का होता है-
1- कृष्ण यजुर्वेद- इसमें  गद्य तथा पद्य दोनों है! 
2- शुक्ल यजुर्वेद- इसमें केवल पद होते हैं इसे वाजसनेयी  संहिता भी कहते है! 
4- अथर्ववेद-
यह वेद अथर्व ऋषि द्वारा रचित है! 
इस वेद में औषधियों वशीकरण जादू टोना आदि का वर्णन है
इसका उपवेद शिल्प वेद है जिस के रचनाकार विश्वामित्र है! 
इसका ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ है! 
इसमें  काशी का वर्णन तथा मगध महामारी फैलने का वर्णन  भी किया गया! 
🟠 पुराण- पुराणों की संख्या 18 इनके संकलनकर्ता लोमहर्ष तथा उसके पुत्र उग्रश्रवा है सबसे प्राचीन तथा प्रमाणित पुराण मत्स्य पुराण है
🟠 आरण्यक ग्रंथ- 
वनों में रचे गए यह ग्रंथ है जो वानप्रस्थ आश्रम के ऋषि द्वारा लिखे जाते हैं! 
इनका उद्देश्य है ईश्वर की उपासना में बोल देना! 
इनकी संख्या 7 है- ऐतरेय तैत्तिरीय माध्यन्दिन शंखायन  मैत्रायणी मलवकार वृहदारण्यक ! 
🟠 उपनिषद-
गुरु के समीप निष्ठा पूर्वक बैठना उपनिषद का अर्थ होता है! 
यह दार्शनिक विचारधारा के ग्रंथ है! 
इनकी संख्या 108 है इसमें 11 वह13 प्रमुख है! 
दारा शिकोह ने उपनिषदों का फारसी अनुवाद किया था! 
शंकराचार्य ने उपनिषदों में भारतीय की रचना की जिसे वेदांत दर्शन कहा जाता है! इनकी संख्या 6 है शिक्षा ज्योतिष कल्प व्याकरण निरुक्त छंद! 
सत्यमेव जयते मुंडकोपनिषद से लिया गया! 
        ऋग्वेदिक सभ्यता(1500-1000 ईसा पूर्व) 
🟠भौगोलिक विस्तार- यह सप्त सैंधव क्षेत्र में फैली था! अर्थात  7 नदियों से घिरा क्षेत्र यह नदियां सिंधु सरस्वती सतलाज व्यास रावी झेलम चिनाब थी! 
🟠 राजनीतिक जीवन- आर्यो  को पंच जन कहते थे क्योंकि इनके 5 कबीले होते थे- पुरू अनु द्रुहू  तुर्वस यदु थे! 
महत्वपूर्ण प्रशासनिक शब्द-
राजन या गोप- राष्ट्री का मालिक
पुरोहित- जन का मालिक
विशापति- विश का मालिक
ग्रामीणी- गांव या ग्राम का मालिक
कुलुप- कुल का मालिक
Note- ऋग्वैदिक काल में कुल सबसे छोटी इकाई थी
सभा और समिति दोनों ऋग्वैदिक काल की जनतांत्रिक संस्थाएं मानी जाती है! 
महत्वपूर्ण-
विदथ सबसे प्राचीन संस्था थी, इसका ऋग्वेद में 122 बार उल्लेख हुआ है जबकि समिति का 9 बार और सभा का 8 बार उल्लेख हुआ है। सभा वृद्ध जनों एवं कुलीन लोगों की संस्था थी। समिति कबीले की आम सभा होती थी।  जिसका राजा पर पूर्ण नियंत्रण होता था स्त्रियां सभा और समिति में भाग लेती थी !विदथ के संगठन और कार्यों के बारे में स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
बली एक प्रकार का कर था जो जनता स्वेच्छा से राजा को देती थी! 
ऋग्वेद के सातव मंडल में दसराज युद्ध का वर्णन किया गया है जो परुष्णी अर्थात रावी नदी के तट पर भरत जन तथा 10 अन्य जनों के बीच हुआ था इसमें भरत जन के प्रमुख सूदास की विजय हुई! 
🟠 आर्थिक स्थिति- 
यह सभ्यता एक कृषि प्रधान ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाली सभ्यता थी जिसका प्रमुख व्यवसाय पशुपालन था! 
गाय को अघग्या कहा जाता था! और सबसे उपयोगी पशु घोड़ा था! 
इस काल में लोहे का प्रचलन नहीं था और सर्वप्रथम ताबे का प्रयोग किया था! 
✴️ आर्थिक स्थिति से जुड़ी शब्दावली-
त्वष्ठा या तक्षण- बढ़ई
कमरि- धातुकार
यव- जौ
उर्दर- अनाज मापने वाला एक पात्र
हिरण्य- सोना
अयस- तांबा
🟠 सामाजिक स्थिति-
ऋग्वेद के दसवें मंडल में पुरुष सूक्त चार वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख है परंतु यह अस्तित्व में उत्तर वैदिक काल में आए! 
ऋग्वैदिक काल पितृसत्तात्मक था परंतु स्त्रियों की स्थिति काफी अच्छी थी! परिवार के मुखिया को कुलक(पिता) कहा जाता था
इस समय बाल विवाह सती प्रथा दहेज प्रथा पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था! 
सोम रस प्रमुख पेय पदार्थ था! 
समाज में विधवा विवाह  दास प्रथा नियोग प्रथा का प्रचलन था! 
Note- जब किसी स्त्री के बच्चे नहीं होते या उसके पति की अकाल मृत्यु हो जाती है तो वह अपने देवर या संबंधी द्वारा गर्भ धारण करती है इसे ही नियोग प्रथा कहते हैं! 
इस काल की प्रमुख स्त्रियां लोपमुद्रा घोषा अपाला  विश्ववरा थी! 
 Note- जीवन भर अविवाहित स्त्री को अमाजु कहा जाता था! 

🟠 धार्मिक स्थिति-
आर्यों ने प्राकृतिक शक्तियों का दैव्यकरण किया! 
यासक ने देवताओं को तीन भागों में बांटा-
1- आकाशवासी देवता-
धौ/धौस- सबसे प्राचीन देवता इन्हें सर्जन का देवता कहा जाता था 
इनकी तुलना यूनानी देवता ज्यूस के सामान की जाती है! 
सूर्य- उगता हुआ सूरज इन्हें तेज का देवता कहा जाता है! 
वरुण- इसे ऋत का संरक्षक या ऋतस्यगोप को कहा जाता है इनका ऋग्वेद में सातवें मंडल मे 30 बार उल्लेख है इन्हें देवताओं का देवता कहा जाता है! समुद्र का देवता, विश्व के नियामक और शासक सत्य का प्रतीक, आकाश, पृथ्वी एवं सूर्य का निर्माता के रूप में जाना जाता है। 
Note- ऋतस्यगोप का मतलब होता है ऋतु परिवर्तन एवं दिन रात का कर्ताधर्ता! 
उषा- इन्हें उत्थान की देवी या प्रगति की देवी कहा जाता है! 
सविता(सावीत्री)- इन्हें अमृत की देवी कहा जाता है ऋग्वेद का तीसरा मंडल में वर्णित गायत्री मंत्र इन्हीं को समर्पित है! 
षूषन- पशुओं के देवता थे जो उत्तर वैदिक काल में शूद्रों के प्रमुख देवता बन गए! 
अश्वनी- चिकित्सा के देवता
विष्णु- विश्व का संरक्षक

2.अंतरिक्ष के देवता-
इंद्र- इन्हें युद्ध का देवता कहा जाता था यह आर्यों के प्रमुख देवता थे जिनके लिए ऋग्वेद में 250 सूक्त है! 
मरुत- इन्हें तूफान का देवता कहा जाता है! 
पर्जन्य (बादल)- इन्हें वर्षा का देवता कहा जाता है! 

3. पृथ्वी के देवता-
पृथ्वी- सर्जन की देवी
अग्नि- इन्हें अतिथि देवता या आर्यों का पुरोहित कहा जाता है इनके लिए ऋग्वेद में 200 श्लोक है! 
सोम- इन्हें वनस्पति का देवता कहते हैं इनका वर्णन ऋग्वेद के नवे मंडल में है इनके लिए 120 श्लोक है!
बृहस्पति- यज्ञ के देवता

      उत्तर वैदिक काल (1000-600 ईसा पूर्व) 

✴️ इस काल को ब्राह्मण धर्म काल भी कहते हैं! 
✴️ लोहे की खोज होने के कारण इसे लोगों प्रौद्योगिकी युग भी कहा जाता है! 
✴️ इस काल में सर्वप्रथम चित्रित मृदभांड मिले हैं! 
✴️ इस काल का केंद्र गंगा यमुना का दोआक था जो कुरुक्षेत्र तक था! 

राजनीतिक स्थिति-
इस काल में राजा के दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत अस्तित्व में आया जिसका पहला वर्णन ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है! 
राजा का  वंशानुगत  हो गया था जिसे सम्राट या एकराट कहा जाता था! 
बली एक अनिवार्य कर हो गया था जो ऊपर का 1/16वा भाग  हो गया था! 
Important- प्राचीन धर्म ग्रंथों के अनुसार कर की दर 1/6 भाग थीl
विजयनगर राजवंश प्राचीन धर्म ग्रंथों मे वर्णित  कर की दर पर आधारित कर वसूल करता था! 

🟠प्रमुख अधिकारी-
रत्नी- राज्य के उच्च अधिकारी को रत्नी कहते हैं जिसका वर्णन  शतपथ ब्राह्मण में 12 बार आया है! 
सूत- सारथी
भागदूध- कर संघकर्ता
महिषी- प्रमुख रानी
पालागत- विद्वान
श्रमण- वेद विरोधी अध्यापक

🟠आर्थिक स्थिति-
इस काल का मुख्य व्यवसाय कृषि था! 
अतरंजीखेड़ा (यूपी) से कृषि के लोहे के यंत्र मिले हैं जो लोहे का प्रथम प्रमाण है! 
इस काल में मुद्रा का प्रचलन हो गया था निष्क जो ऋग्वैदिक काल में स्वर्ण आभूषण था! यह उत्तर वैदिक काल मैं प्रमुख मुद्रा बन गई थी! 
इस काल में उर्फ(उन) और शज(सन) का उल्लेख मिलता है! 
🟠 धार्मिक स्थिति-
इस काल में कर्मकांड ओं का उदय हुआ! 
सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में पुर्वजन्म व मृत्यु का उल्लेख है जबकि मोक्ष का वर्णन उपनिषदों  मे मिलता है! 
इस काल के प्रमुख देवता-
प्रजापति- सर्वोच्च देवता तथा सर्जन के देवता
रुद्र- पशु का देवता
विष्णु- विश्व का संरक्षक
पूषक- यह शूद्रों के देवता थे! 

🟠 सामाजिक स्थिति-
चार वर्णो का उदय हुआ- ब्राह्मण क्षेत्रीय शूद्र वैश्य
इस काल में स्त्रियों की स्थिति मैं गिरावट आई इस काल की प्रमुख स्त्रियां- गार्गी गंधर्व गृहिता मैत्रीय वेदवती थी! 
जाबालोपनिषद में चार आश्रमों का उल्लेख है! 
✴️इस काल में त्रिऋण का उल्लेख है-
1.पितृ ऋण- संतान उत्पन्न करने से
2. ऋषि ऋण- वेदों के अध्ययन से
3. देव ऋण- यज्ञ करने से

🟠 विवाह के 8 प्रकार-
1- ब्रह्मा विवाह- योग्य वर के साथ विवाह
2- देव विवाह- पुरोहित के साथ विवाह
3- आर्ष विवाह- दो गायों के बराबर धन देकर किया जाने वाला विवाह! 
4- प्रजापत्य विवाह- पिता द्वारा कन्या का हाथ माग कर के किया गया विवाह
Note- ब्रह्मा विवाह देव विवाह आर्ष विवाह प्रजापत्य विवाह इन विवाह को प्रसन्न विवाह कहते है! 
5- असुर विवाह- धन के बदले किया जाने वाला विवाह
6- गंधर्व विवाह- प्रेम विवाह
7- पैचास विवाह- बलात्कार करके किया जाने वाला विवाह
8- राक्षस विवाह- बलपूर्वक किया जाने वाला विवाह

🟠 प्रमुख यज्ञ-
अश्वमेघ यज्ञ- राजा द्वारा साम्राज्य विस्तार के लिए घोड़ा छोड़ दिया जाता है! 
Note- अंतिम अश्वमेघ यज्ञ सवाई जयसिंह ने कराया था! 
राजसुय यज्ञ- राज अभिषेक के दौरान किया गया यज्ञ! 
वाजपेई यज्ञ- शक्ति प्रदर्शन के लिए रथ दौड
अग्निष्टोम यज्ञ- पापों से मुक्त से संबंधित यज्ञ
सौत्रामंणि यज्ञ- पशु बलि
पुरुषमेध यज्ञ- राजनीतिक वर्चस्व के लिए विद्वान पुरुष की बलि दी जाती थी! 

🟠षड्दर्शन- 
1. लोकायत दर्शन- इसके लेखक चार्वाक है! 
2. योग दर्शन- पतंजलि
3. साख्य दर्शन- कपिल
4. न्याय दर्शन- गौतम
5. उत्तर मीमांसा- बादरायण
6. पूर्व मीमांसा- जैमिनी



प्रागैतिहासिक काल (भारतीय इतिहास भाग-1)

                   ✴️ प्रागैतिहासिक काल ✴️
प्रागैतिहासिक काल  ऐसा काल जिसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिला
✴️ इस काल की खोज का श्रेय रॉबर्ट ब्रूस फुट को जाता है 30 मई 1863 चिंगलपुट जिला मद्रास के पल्लवरम में लैटेराइट मृदा से निर्मित हस्त कुठार की खोज की! 
नोट- रॉबर्ट ब्रूस फुट को प्रागैतिहासिक काल का पिता कहा जाता है! 
🟠प्रागैतिहासिक काल को तीन भागों में बांटा गया-
1- पुरापाषाण काल
2- मध्य पाषाण काल
3- नवपाषाण काल
1-पुरापाषाण काल- इस काल में मनुष्य शिकार कर अपना जीवन यापन करता था इस कारण इसे आखेटक युग भी कहा जाता है इसके अध्ययन को तीन भागों में बांटा गया-
1- निम्न पुरापाषाण काल
2- मध्य पूरापाषाण काल
3- उच्च पुरापाषाण काल
✴️ निम्न पुरापाषाण काल-
👉 अग्नि का ज्ञान
👉 मानव ने सर्वप्रथम क्वार्टजाइट पत्थर का प्रयोग किया
नोट- उपकरणों के आधार पर निम्न पुरापाषाण काल को दो भागों में बांटा गया है-
1-चौपर या चापिंग पेबुल संस्कृति- इस संस्कृति का साक्ष्य पंजाब कि सोहन नदी घाटी से मिला है! 
2- हैण्ड एक्स संस्कृति- 30 मई 1863 में रॉबर्ट ब्रूस फुट ने पल्लवरम में हैंड एक्स की खोज की थी! 
Imp- 1982 अरुणसोनकिया ने हथनोरा (नर्मदा नदी के मध्य का स्थान) होशंगाबाद(mp) में मानव कपाल खोजा गया जो मानव अस्थि का पहला साक्ष्य है! 
✴️ मध्य पुरापाषाण काल- 
👉इस समय जैस्पर,चर्ट,फिलेट का प्रयोग किया गया! 
Imp- फलकों की अधिकता के कारण इस काल को एचडी संकालिया ने फलक संस्कृति की संज्ञा दी हैl
✴️ उच्च पुरापाषाण काल-
👉इस काल में धार धार हत्यारों का प्रयोग होने लगा था! 
👉आधुनिक मानव (होमोसेपियंस) का उद्गम हुआ! 
महत्वपूर्ण तथ्य-
👉 पुरापाषाण काल को खाद्य संग्रहक काल भी कहा जाता है! 
👉 यूपी के लोहदानाला नामक स्थान की बेलन घाटी  से विश्व की सबसे प्राचीन अस्थि निर्मित स्त्री की मूर्ति प्राप्त हुई है अर्थात मातृ देवी की मूर्ति प्राप्त हुई है! 
👉 भीमबेटका की गुफा (मध्य प्रदेश) से मानव की चित्रकारी का प्रथम प्रमाण मिला है इसे मानव द्वारा निर्मित पहला घर भी कहा जाता है! 

2. मध्य पाषाण काल-
इस काल में औजार छोटे छोटे पत्थरों के बने होते थे इसलिए इस काल को माइक्रोलॉपिक या  सूक्ष्मपाषाण काल कहते हैं! 
सर्वप्रथम 1857 में सी.एल. कार्लाइल ने विन्ध्यक्षेत्र से इस काल में पशुपालन के सर्वप्रथम संकेत मिले! 
मध्यपाषाण काल के प्रमुख स्थल-
✴️बागौर (भीलवाड़ा जिला राजस्थान)- 1970 में बीएन मिश्रा ने इस स्थल को कोठारी तट पर खोजा जो मध्यपाषाण काल का सबसे बड़ा स्थल है! 
 Note- बहुत से स्त्रोतों से पता चलता है कि यहां से पशुपालन के साक्ष्य मिले जो प्रथम साक्ष्य हैं! 
✴️ सराय नहर राय (उत्तरप्रदेश)- इस स्थल से युद्ध में हत्या के साक्ष्य मिले हैं और एक कब्र से तीन कंकाल मिले हैं जिसके सर में पत्थर से चोट लगी है! 
✴️महदहा- यह स्थान उत्तर प्रदेश में है यहां से स्त्री पुरुष के एक साथ दफनाने के साक्ष्य मिले हैं! 
✴️ आजमगढ़ (होशंगाबाद जिला मध्य प्रदेश)- यहां से पशुपालन के  प्रथम साक्ष्य मिले हैं! 
✴️लंघनाज- गुजरात के इस स्थान से 14 कंकाल प्राप्त हुए हैं! 

3. नवपाषाण काल-
इस काल से पाहिए और  तिथि के साक्ष्य मिले हैं! 
इस काल का प्रथम वर्णन जॉन लूबाक की पुस्तक  प्रीहिस्टोरिक में मिलता है!
इस काल का प्रथम साक्ष्य 1842 में डॉक्टर प्राइमरोज द्वारा लिंगसूगूर (कर्नाटक) से प्रथम पोलिसदार कुल्हाड़ी खोजी ! 
इस युग के प्रमुख स्थल-
✴️मेहरगढ़- यह स्थान पाकिस्तान के बलूचिस्तान में है जहां से कृषि के प्रथम साक्ष्य मिले! 
✴️बर्जहोम- यह स्थान कश्मीर में है जहां से मालिक के साथ कुत्ते को दफनाने की साक्ष्य मिले है! 
Note- मानव का पहला पालतू पशु कुत्ता था! 
सिंधु स्थल रोपड़ पंजाब से भी कुत्ते के साथ मनुष्य दफनाने के साक्ष्य मिले! 
✴️गुफकराल- यह स्थल कश्मीर में है जहां से सिलबट्टा मिला! 
✴️कोल्डिहवा- यह स्थल बेलन नदी के तट पर इलाहाबाद में है!  यहां से चावल के प्राचीनतम साक्ष्य मिले जो 6500 ई.पु. के है! 
✴️चिरांद- यह स्थान बिहार में स्थित है यहां से सबसे अधिक हड्डियों के उपकरणो की प्राप्ति हुई है! 
✴️चोपानी मांडो- यह स्थान उत्तर प्रदेश में है जहां से विश्व के सबसे प्राचीन हस्त निर्मित मृदभांडो के साक्ष्य मिले है!  




Saturday, February 19, 2022

उत्तराखंड जिला दर्शन

                  उत्तराखंड जिला दर्शन
उत्तराखंड में 13 जिले और 2 मंडल है! कुमाऊं मंडल में 6 जिले और गढ़वाल मंडल में 7 जिले हैं! 
कुमाऊं मंडल- 1815 में कुमाऊं को नॉन रेगुलेटिंग जिला बनाया गया! 1829 में  कुमाऊं कमिश्नरी का सर्जन हुआ! 1854 मे  इसका मुख्यालय अल्मोड़ा से नैनीताल बनाया गया!  कुमाऊं मंडल  में 6 जिले आते है:- अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर, उधमसिंह नगर, चंपावत
गढ़वाल मंडल- गढ़वाल मंडल की स्थापना दिसंबर  1968 में हुई परंतु उसने अपना कार्य जनवरी 1969 से प्रारंभ किया  आरंभ में इसमें चार जनपद थे! वर्तमान में इसमें सात जनपद है:-देहरादून,पौड़ी,हरिद्वार,चमोली,टिहरी,उत्तरकाशी,रुद्रप्रयाग
उत्तराखंड के जनपदों का गठन-
अल्मोड़ा- 1891 
नैनीताल- 1891
पौड़ी गढ़वाल- 1839
टिहरी- 1 अगस्त 1949
पिथौरागढ़- 24 फरवरी 1960 
चमोली- 24 फरवरी 1960
उत्तरकाशी- 24 फरवरी 1960 ई
देहरादून-  1817
Imp- देहरादून जनपद की स्थापना 1817 में हुई परंतु 1975 में देहरादून को उत्तराखंड स्थित गढ़वाल मंडल में स्थानांतरित कर दिया गया तथा 1975 से यह गढ़वाल मंडल में स्थित है 1817 में यह जिला बनकर मेरठ मंडल में शामिल था! 
हरिद्वार- 28 दिसंबर 1988
उधम सिंह नगर- 29 सितंबर 1995
Note- बहुत स्त्रोतों में 26 दिसंबर 1995 दिया! 
चंपावत- 15 सितंबर 1997
बागेश्वर- 15 सितंबर 1997
नोट- बहुत से स्त्रोतों में बागेश्वर की स्थापना 18 सितंबर 1997 दि है! 
रुद्रप्रयाग- 16 सितंबर 1997
नोट- बहुत से स्त्रोतों में रुद्रप्रयाग की स्थापना 18 सितंबर 1997 दिया है! 

               ✴️ कुमाऊ के जनपद✴️
कुमाऊं में उत्तराखंड के 6 जनपद आते है! जिनका का विवरण निम्नलखित है! 
                ✴️ अल्मोड़ा जनपद✴️

अल्मोड़ा जनपद 1891 पर में अस्तित्व में आया इसका मुख्यालय 1892 में  अल्मोड़ा को बनाया गया! 
अल्मोड़ा नगर खसिया खोलें डांडे के ऊपर बताया गया है! 
 Note- मानस खंड के अल्मोड़ा जनपद की स्थापना 13 अक्टूबर 1892 को भी हुईl
किल्मोड़ा घास  अधिकता के कारण इसका नाम अल्मोड़ा पड़ा! 
अल्मोड़ा जनपद नैनीताल बागेश्वर चंपावत पौड़ी गढ़वाल पिथौरागढ़ चमोली से सीमा बनाता है! 
अल्मोड़ा शहर की स्थापना 1530 एचडी में राजा भी पसंद की थी जो चंद्रवंशी का 43 वा राजा था इसे राजधानी 1563  में कल्याण चंद ने बनाई थी! 
अल्मोड़ा का क्षेत्रफल 3139 वर्ग किलोमीटर हैl
अल्मोड़ा का लिंगानुपात 1139 है यह राज्य का सर्वाधिक लिंगानुपात वाला जिला है! 
अल्मोड़ा का जनसंख्या घनत्व 198 हैl
अल्मोड़ा का शिक्षा लिंगानुपात 922 है यह राज्य का सबसे अधिक लिंगानुपात वाला जिला है! 
अल्मोड़ा की दशकीय वृद्धि दर -1.28% है! 
अल्मोड़ा के उपनाम बाल मिठाई का घर, संस्कृतिक नगरी, ताम्र नगरी, पटाल नगरी है! 
अल्मोड़ा के प्राचीन नाम रामक्षेत्र,आलमनगर खगमरकोट,राजापुर है! 
अल्मोड़ा की साक्षरता 80.47% है! 
अल्मोड़ा में 11 विकासखंड 12 तहसील 6 विधानसभा क्षेत्र है! 
अल्मोड़ा में 1817 में रैमजे कॉलेज छावनी कचहरी नॉर्मल स्कूल की स्थापना हुई! 
अल्मोड़ा नगर पालिका परिषद की स्थापना 1864 में हुई! 
उत्तराखंड की प्रथम जेल 1816 अल्मोड़ा में बनाई गई! 
उत्तराखंड की पहली मस्जिद की स्थापना अल्मोड़ा में ही हुई! 
अल्मोड़ा का वर्णन महात्मा गांधी की पुस्तक मेरी कुमाऊं यात्रा तथा विवेकानंद जी की पुस्तक कोलंबो से अल्मोड़ा में भी मिलता है! 
अल्मोड़ा मिशन स्कूल की स्थापना 1844 में तथा अल्मोड़ा टाउन स्कूल की स्थापना 1907 में हुई! 
सोबान सिंह जीना केंपस अर्थात अल्मोड़ा कॉलेज पहले आगरा विश्वविद्यालय से संबंधित डिग्री कॉलेज था 1973 में कुमाऊं विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ  यह कुमाऊ का महाविद्यालय बन गया 1994 में इसे कैंपस का दर्जा प्राप्त हुआ! 
6 सितंबर 2016 को उत्तराखंड आवासीय विश्वविद्यालय अल्मोड़ा में खोला गया! 
1871 में यहां से अल्मोड़ा अखबार का प्रकाशन हुआ जो साप्ताहिक अखबार था जिसके संपादक बुद्धि बल्लभ पंत जी थे! 
✴️अल्मोड़ा जनपद के प्रमुख दार्शनिक स्थल✴️
 वीरणेश्वर मंदिर-
भगवान शिव के इस मंदिर का निर्माण राजा कल्याण चंद ने कराया था जो चंद वंश  44 नंबर का राजा था! 
यह मंदिर बिनसर पहाड़ी पर झंडीधार नामक स्थान पर स्थित है! 
विभाण्डेश्वर मंदिर-
इसे द्वाराहाट मंदिर भी कहते हैं! 
इस मंदिर को उत्तर के काशी के नाम से भी जाना जाता है! 
यह मंदिर सुरभि तथा नंदिनी नदी के तट पर है! 
यहां विषुवत संक्रांति के समय स्याल्दे विखौती मेला लगता है
1943 में महात्मा लक्ष्मी नारायण दास ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था! 
यहां मंदिर नागार्जुन या नागार्धर पर्वत पर है! 

गणनाथ मंदिर-
इस मंदिर का निर्माण श्री वल्लभ जी महामहोपाध्याय किसी के पास इन्होंने उदय नौला भी बनाया! 
यह भगवान शिव को समर्पित मंदिर है जहां प्रकृति रूप से जल  टपकता रहता है
गणनाथ की चोटी पर मलिका देवी मंदिर भी स्थित है! 

चितई मंदिर-
कुमाऊं में न्याय के देवता या  कुमाऊ का परमोच्च न्यायालय के रूप से पूजा जाता है!
इन को पशु का रक्षक देवता  के रूप में भी पूजा जाता है! 
गोलू देवता के मंदिर चंपावत घोड़ाखाल पौड़ी और ताड़ीखेत में स्थित है! 

नंदादेवी मंदिर-
इसे कोटभ्रामरी  देवी का मंदिर भी कहते हैं! 
नंदा देवी की स्वर्ण प्रतिमा ज्ञान चंद्र तथा साधरण प्रतिमा बाज बहादुर चंद्र लाया था! 
कमिश्नर ट्रेल ने नंदा देवी की मूर्ति को पर्वतेश्वर मंदिर में रखा तब से इसे नंदा देवी के रूप में पूजा जाता है! 
भाद्रपद की अष्टमी को यहां विशाल मेला लगता है! 

जागेश्वर मंदिर समूह-
अल्मोड़ा का सबसे बड़ा मंदिर समूह है! 
यह जाटगंगा नदी के संगम में है! 
यहां वर्तमान में 25 मंदिर हैं परंतु पहले यहां 124 छोटे बड़े मंदिर थे! 
उत्तराखंड का पांचवा धाम भी माना जाता है! 
जन शक्तियों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण विश्वकर्मा ने कराया था और इसका जीर्णोद्धार कत्यूरी राजा शालिवाहन देव ने कराया! 
जागेश्वर मंदिर समूह का सबसे प्राचीन मंदिर महामृत्युंजय मंदिर है तथा सबसे बड़ा मंदिर दिनदिनेश्वर मंदिर है! 
यह मंदिर केदारनाथ शैली का है! 
पुराणों में इस मंदिर को हाटकेश्वर तथा भू राजस्व लेख में पट्टी पारुणेक ने कहा गया! 
जागेश्वर मंदिर में नव दुर्गा मंदिर महिषमर्दिनी मंदिर लवलीश मंदिर नटराज मंदिर का निर्माण इष्टगण ने की थी! 
जागेश्वर के मुख्य मंदिर के भीतर दीपचंद तथा त्रिमल्लचंद  की अष्ट धातु से निर्मित मूर्ति मिली है! 
शंकराचार्य ने जागेश्वर के प्रबंध हेतु दक्षिण भारत के जंगमकुमारों की नियुक्ति की! 
हाथ में दीपक युक्त थाल थामे हुए राजा दीपचंद और उसकी पत्नी की काष्ट मूर्ति मिली है
यहां प्रसिद्ध पूश्ती माता मंदिर भी है! 

वृद्ध जागेश्वर मंदिर-
यह जागेश्वर से कुछ दूरी में स्थित है यहां क्षेत्रपाल मंदिर भी स्थित है! 

झांकर सैम मंदिर-
यह स्थानीय लोक देवता है! 

द्वाराहाट-
उत्तराखंड में मंदिरों की नगरी के नाम से जाना जाता है! 
हिमालय की द्वारिका मंदिरों की नगरी मीठी मूलियो का क्षेत्र कुमाऊ का खुजराहो  के नाम से भी द्वाराहाट को जाना जाता है!
कत्यूरी राजाओं ने यहां 30 मंदिरों तथा 365 बोरियों का निर्माण कराया था इसलिए यह क्षेत्र कत्यूरी राजाओं के कलाप्रेमी तथा धर्मनिष्ट होने का प्रतीत है! 
राहुल सांकृत्यायन के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 11 वीं से 12 वीं शताब्दी के मध्य हुआ! 
द्वाराहाट मंदिर समूह का सबसे बड़ा मंदिर गुजर देव मंदिर है जिसे ध्वज मंदिर के नाम से भी जाना जाता है! ! 
द्वाराहाट के अन्य मंदिर समूह-
महामृत्युंजय मंदिर समूह
मनियान मंदिर समूह
रतन देवल मंदिर समूह
कचहरी देवी मंदिर  समूह
केदारनाथ बद्रीनाथ मंदिर समूह
द्वाराहाट में  बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण सुधा देव ने किया! 

रानीखेत-
कत्यूरी रानी जिया रानी इस स्थान पर कुछ समय के लिए रही थी इसलिए इसे रानीखेत कहते हैं! 
इस का प्राचीन नाम ऑकलैंड होल्स कहते है! 
इसे पर्यटकों की नगरी भी कहा जाता है! 
यह झूला देव पर्वत पर गगास नदी के तट पर स्थित है! 
गगास नदी पर भालू डैम है जिसे स्वर्ण ताल भी कहते हैं! 
नाग देवता ताल पर स्थित है! 
चिलियानौला भी रानीखेत में स्थित है! 
कुमाऊं रेजिमेंट का मुख्यालय एवं संग्रहालय भी यही स्थित है! 
अमेरिका के न्यायाधीश विलियम दोगाल्स  ने इसे विश्व का सर्वोत्तम हिल स्टेशन माना है
रानीखेत की सुंदरता से प्रभावित होकर नीदरलैंड के राजदूत (रोटरियन- एफ.ए वैरनमान) ने कहा है-"who has not visited ranikhet has not seen india"
ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड मेयो रानीखेत अत्यधिक प्रिय था! 
रानीखेत के पर्यटक स्थल-
उपट कालिका मंदिर, हैडा खान मंदिर, पण्डु्खोली गुफा, गोल्फ कोर्स, झूला देवी मंदिर, केआरसी म्यूजियम, मनकामेश्वर विनसर महादेव मंदिर, मजखाली, चौबटिया गार्डन  शीतला खेत इत्यादि! 
 Note-झूला देवी मंदिर दुर्गा देवी तथा भगवान राम के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है! 
पाण्डूखोली गुफा  में पांडवों ने निवास किया था इसी के पास भी  महावतार बाबा गुफा(द्वाराहाट) बलवंत गिरी आश्रम तथा भीम की खातड़ी नामक मैदान भी है! 


चौबटिया-
फलोधान का देश(आरचर्ड कंट्री) के नाम से किसे जाना जाता है! 
1932 में यहां फल संरक्षण एवं शोध केंद्र की स्थापना की गई! 
यहां सरकारी सेब का बगान भी स्थित है! 

दूनागिरी मंदिर-
इस मंदिर की स्थापना 1183 में द्रोणांचल पर्वत में की गई! 
दूनागिरी मंदिर वैष्णवी शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है! 
प्राचीन समय में 365 सीढ़ियां होने का अनुमान था वर्तमान में यहां 510 सीढ़ियां स्थित है
द्रोण ऋषि के आश्रम स्थित होने के कारण इसे दूनागिरी नाम से जाना जाता है! 
यहां दूनागिरी झूला भी स्थित है जो नवविवाहित जोड़ों के लिए प्रसिद्ध है! 

चौखुटिया-
या राम गंगा नदी के तट पर है यह काली और वैष्णवी मंदिर हेतु प्रसिद्ध है! 
यहां से कत्यूरी राजवंश की राजधानी के अवशेष मिले हैं 
कत्यूरी राजवंश के इतिहास में इसे बैराट क्षेत्र के नाम से जाना जाता था! 
लखनपुर रामगंगा नदी के तट पर चौखुटिया से 10 किलोमीटर दूर वैराटनगर के सम्मुख है!  अंतिम कत्यूरी राजा ब्रह्मादेव यही का राजा था! 

चौखुटिया ब्लॉक में राम पादुका तीर्थ, अग्नेरी देवी(अन्यारी देवी मंदिर),बैरागढ़, लखनपुर स्थित है! 

राम पादुका तीर्थ-
असुरफाट पहाड़ी की दीवार घाटी में पश्चिमी रामगंगा नदी के तट स्थित इस तीर्थ की मान्यता हरिद्वार के समान है! 
इसी के पास इंद्रेश्वर महादेव मंदिर भी है! 


ताडीखेत-
गांधी कुटिया और गोलू देवता के मंदिर के लिए यह प्रसिद्ध है! 

शीतलाखेत-
यहां स्याही देवी का मंदिर है  किसी के पास खुटगांव है जहां गोविंद बल्लभ पंत जी का जन्म हुआ था! 

जालना- 
यह क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के फलों के लिए प्रसिद्ध है! 

कलबिष्ट मंदिर-
अल्मोड़ा से 22 किलोमीटर दूरी पर स्थित है! 

सल्ट क्षेत्र-
5 सितंबर 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहां गोलाबारी हुई और कई लोगों की मौत हुई जिस कारण गांधी जी ने इसे कुमाऊ का बारदोली कहां है! 

सोमेश्वर-
कोसी नदी के तट पर इस शिव मंदिर को 700 ईसवी में राजा सोमचंद्र ने बचाया था 
इसकी मान्यता काशी के विश्वनाथ मंदिर के समान है
यह खेती के लिए प्रसिद्ध है इसका नाम सेरा भी है! 
यहां दुग्ध कुंड दुग्ध नौला जुठा नौला स्थित है! 

कटारमल सूर्य मंदिर- 
उत्तराखंड शैली का यह मंदिर लंगड़ा ब्लाक के अंतर्गत आता है! 
उड़ीसा के सूर्य मंदिर के बाद यह एक प्रसिद्ध सूर्य मंदिर है! 
इसका निर्माण नवी से 10 वीं शताब्दी के मध्य कत्यूरी राजा कटारमल ने  कोसी नदी के तट पर किया था! 
इस मंदिर को बूटाधारी सूर्य मंदिर या बडदित्य मंदिर के नाम से भी जाना जाता है! 
इस मंदिर के कपाट वर्तमान में दिल्ली संग्रहालय में रखे गए! 
इस मंदिर के समीप गोविंद बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण संस्थान भी है! 
इसके पास रणचंडी मंदिर अंधेरी सुनार गांव पूर्वाभिमुखी मंदिर है! 
यह मंदिर छोटे बड़े 45 मंदिरों का समूह है यहां शिव पार्वती नरसिंह कुबेर महिषासुरमर्दिनी की भी मूर्तियां है! 

बिनसर महादेव मंदिर-




Monday, February 14, 2022

उत्तराखंड में गोरखा शासन

कुमाऊं के गोरखा प्रशासक-
गोरखा ने कुमाऊ पर 1790 में शासन स्थापित किया इस समय नेपाल का राजा रण बहादुर शाह था! की संरक्षिका राजेंद्र लक्ष्मी या इंद्र लक्ष्मी थी बाद में यह सन्यासी स्वामी निर्गुणानंद के नाम से जाना जाता है! 
कुमाऊ का प्रथम सुब्बा- कुमाऊ का पहला सुब्बा जोग मल्ल शाह था! इसने कुमाऊं में 1791 आने पर मैं पहला भूमि बंदोबस्त कराया! 
काजी नरशाही- यह एक अत्याचारी प्रशासक था जो मंगल की रात के लिए प्रसिद्ध था! 
सुब्बा बमशाह- यह अंतिम नेपाली प्रशासक था इतने नेपाल के लिए डाक चौकिया भी बनाई थी! 

गढ़वाल के गोरखा प्रशासक-
गोरखा शासन की स्थापना गढ़वाल में 1804 में हुई इस समय नेपाल का राजा विक्रमशाह था
अमर सिंह थापा- यह गढ़वाल का पहला प्रशासक था जिसे कुमाऊं और गढ़वाल दोनों की जिम्मेदारी थी इसे सर्वोच्च न्यायाधीश भी कहा जाता था नेपाल की सबसे बड़ी उपाधि काजी इसे मिली थी! 
रणजोर सिंह थापा- यह अमर सिंह थापा का पुत्र था जिसे मौला राम ने दानवीर कर्ण की उपाधि दी इसने प्रशासन की मदद के लिए सभा मंडली तथा विचारी और आचारी पदों का सृजन किया! 
हस्तीदल चौतरिया- यह शांत प्रगति का शासक था कितने किसानों को कम लगान दर पर ऋण दिया था! 
भैरो थापा- यह अत्याचारी तथा विलाषी प्रगति का शासक था जिसके कारण 1812-15 तक अमर सिंह थापा के प्रतिनिधियों ने यहां शासन किया था! 

अंग्रेजी तथा गोरखाओं के बीच युद्ध के होने के प्रमुख दो कारण थे-
बुटकल प्रांत और दूसरा अंग्रेजों की तिब्बत के साथ व्यापार करने की महत्वाकांक्षा... 
👉 अंग्रेजों की तिब्बत के साथ व्यापार की महत्वाकांक्षा-
गोरखा चाहते थे कि अंग्रेज तिब्बत के साथ व्यापार करें परंतु वह उन्हें कर दे जिसके परिणाम स्वरूप इनके बीच मतभेद उत्पन्न होने लगे.... 
मल्ले राजाओं के साथ मिलकर अंग्रेजों ने नेपाल के विरुद्ध कैप्टन कींगलाक के नेतृत्व में 2800 सेनिक  भेजे जिसमे से 800 सैनिक वापस आए! 

1774 अंग्रेजों ने व्यापारिक जानकारी के लिए जॉर्ज बोगले को भूटान भेजा  नेपाल नरेश पृथ्वी नारायण शाह ने तिब्बत व्यापारियों को पत्र लिखा और इसके साथ व्यापार करने से मना कर दिया इस तरीके से अंग्रेजों का दूसरा कदम भी असफल रहा! 
Note-  बहुत से स्त्रोतों मे दिया है कि बोगले 1794 मे भुटान गया! 
1795 में मौलवी अब्दुल कादिर को नेपाल की आंतरिक स्थिति का पता लगाने को भेजा गया! 
1802-03 में कैप्टन नाक्स नेपाल भेजा परंतु यह कदम भी असफल रहा! 
1812 मूरकाफ्ट व हेयरसी  को तिब्बत भेजा गया परंतु नेपाल प्रशासकों ने इन्हें रास्ते में ही बंदी बना लिया! 

बुटवल प्रान्त के कारण मतभेद- 
यह प्रांत लखनऊ के अंतर्गत आता था यहां का राजा पृथ्वी नारायण था जिसे गोरखा शासक विक्रमशाह और उसके प्रधानमंत्री भीमसेन थापा ने काठमांडू बुलाकर बंदी बना लिया परंतु अंग्रेजों ने लखनऊ जीता जिस कारण यह प्रांत उनका हुआ परंतु गोरखाओ का कहना था राजा उन्होंने बंदी बनाया है क्षेत्र अभी उनका होगा! 
इसके कारण अंग्रेजों और गोरखा में युद्ध हुआ और 24 अंग्रेज बुटवल थाने मे मारे गए! 

इसके बाद लॉर्ड मेयो/ हेस्टिंग्स ने 4 टुकड़िया बनाकर इन पर आक्रमण किया! 

1.मेरठ डिवीजन- इस डिवीजन का नेतृत्व रौलो गिलेस्पी (जिलेस्पी) कर रहा होता है इसकी मदद कर्नल माबी एंव  कारपेंटर कर रहे होते हैं इन्हें दुन क्षेत्र मे  आक्रमण के लिए भेजा गया था! 

लुधियाना डिवीजन-  इस डिवीजन का नेतृत्व डेविड ऑक्टरलोनी कर रहे थे इनने काली नदी से सतलज क्षेत्र पर आक्रमण किया  यह क्षेत्र अमर सिंह थापा के अंतर्गत था! 

दीनापुर डिवीजन- इस डिवीजन का नेतृत्व बैनेट मार्ले कर रहा था इसे काठमांडू में आक्रमण के लिए भेजा लेकिन नेपालियों ने इसे मार मार के भगाया इसलिए इसे एटकिंसन ने बुद्धू जनरल कहा है! 
Note- बैनेट मार्ले हरिहर गढ़ का युद्ध फरवरी 1815 में हारा था! 

बनारस डिवीजन- इस डिवीजन का नेतृत्व जॉन सिलवान वुट कर रहा था  इसे गोरखपुर में आक्रमण के लिए भेजा गया था! 

नालापानी या खलंगा का ऐतिहासिक युद्ध -
बलभद्र शाह अपने 300-400 सैनिकों के साथ नालापानी के किले में होता है वह रालो गिलेस्पी  के साथ युद्ध करने से मना कर देता है और 31 अक्टूबर 1815 को इन दोनों के बीच युद्ध होता है जिसे नालापानी या खलंगा का युद्ध कहते हैं इसमें बलभद्र साहब अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए रालो गिलेस्पी को मार देता है! 
1 नवंबर 1814 में कर्नल मावी और कारपेंटर युद्ध की घोषणा कर देते हैं और किले मैं पानी की पाइप लाइन बंद कर देते हैं जिस कारण बलभद्र साह को किले से बाहर आना पड़ता है 30 नवंबर 1814 को इनके बीच युद्ध होता है जिसमें अंग्रेजों की जीत होती है परंतु बलभद्र साह बचकर भाग जाता है! 
नोट- बिलियन फ्रेजर नालापानी के युद्ध का आंखों देखा वर्णन किया! 
अंग्रेजों का लालमंडी किले पर आक्रमण- अंग्रेजों ने गोरखाओं को पराजित करने के लिए अल्मोड़ा के लालमंडी किले में दो ओर से आक्रमण किया! 
काशीपुर से गार्डनर,हर्षदेव जोशी तथा पीलीभीत और बरेली से कैप्टन हेयरसी ने किया! 

ब्रह्मदेव मंडी का युद्ध- यह युद्ध 14 मार्च 1815 को हुआ इस युद्ध में हस्तीदल चौतरिया कैप्टन हियरसी से पराजित होता है! 
इसके बाद 21 मार्च 1815 को  दिगालीचौड का युद्ध होता है जिसमें हस्तीदल चौतरिया हियरसी  को बंदी बना लेता है! 
Note- दिगालीचौड के युद्ध को खिलपति युद्ध भी कहा जाता है! 

गणनाथ डांडा का युद्ध- यह युद्ध 23 अप्रैल 1815 ताकुला (अल्मोड़ा) में होता है! कैप्टन निकाल्सन हस्तीदल चौतरिया को मार देता है! 

अल्मोड़ा या लालमंडी किले का युद्ध-  25 अप्रैल 1815 को  अंग्रेजों की ओर से गार्डनर और कर्नल निकलसन के नेतृत्व में बमसाह और चामू भंडारी पर युद्ध किया गया! 
बमसाह अंग्रेजों की ताकत भरी बातें समझ गया था उसने इनके साथ 27 अप्रैल 1815 को लाल मंडी की संधि (अल्मोड़ा संधि) कर ली यह संधि बमशाह व गार्डनर  के बीच हुई! 
  Note- लाल मंडी किले को खाली कर इसका नाम फोर्ड मोयरा रखा गया! 
बमशाह  संधि के विषय में अमर सिंह थापा को पत्र लिखा इस समय अमर सिंह थापा ऑक्टरलोनी के साथ युद्ध लड़ रहा था!  ऑक्टरलोनी और अमर सिंह थापा के बीच मालाउगढ की संधि 15 मई 1815 में हूंई! परंतु नेपाल नरेश ने इस संधि को नहीं माना! 

याद रखे-  बमसाह  अंग्रेजों की शक्ति को भलीभांति समझ चुका था उसने इस समस्या का समाधान करने के लिए  स्वर्गीय महाराज रण बहादुर शाह के गुरु गजराज मित्र से मिला! 

Imp- 2 दिसंबर 1815 को संगोली( चंपारण बिहार) पर  राजगुरु गजराज मिस्र, चंद्रशेखर उपाध्याय  और ब्रेड शा के मध्य संगोली की संधि हुई परंतु इसे नेपाल नरेश विक्रम शाह नहीं मानता! 

28 feb 1815 को विवश होकर ऑक्टरलोनी ने काठमांडू से कुछ दूर मकवानपुर के पास गोरखों पर आक्रमण किया और 800 गोरखा सैनिक मार दिए जिस कारण 4 मार्च 1816 को इन्होंने यह संधि मान ली! 
Note- कुछ स्त्रोत मे 28 nov 1815 संगोली संधि अंग्रेजी व अमर संधि थापा के मध्य  हुई! 

Saturday, January 29, 2022

भारत का सामान्य परिचय

                भारत का सामान्य परिचय
भारत एशिया महाद्वीप के अंतर्गत आता है! इसमें 28 राज्यों 8 केंद्र शासित प्रदेश हैl
Note- 31 अक्टूबर 2019 को जम्मू और लद्दाख एवं 26 जनवरी 2020 को  दमन और दीव व दादर एव नागर हवेली केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में अस्तित्व में आए! 
भारत उत्तरी गोलार्ध में विश्वत रेखा के उत्तर में स्थित है इसकी मुख्य भूमि 8°4' उत्तरी अक्षांश से 37°6' उत्तरी अक्षांश के मध्य तथा 68°7 पूर्वी देशांतर से 97°25' पूर्वी देशांतर के मध्य विस्तृत है! 
इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण 3214 किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम 2933 किलोमीटर तक है! 
भारत की स्थल सीमा की लंबाई 15106.7 किलोमीटर तथा इसकी तटीय भाग की लंबाई 7516.6 किलोमीटर और  मुख्य भूमि की तटीय रेखा की लंबाई 6100 किलोमीटर है! 
भारत का क्षेत्रफल 3287263 वर्ग किलोमीटर है क्षेत्रफल की दृष्टि में भारत का सातवां नंबर है! 
 Note-क्षेत्रफल की दृष्टि में सबसे बड़ा देश रूस कनाडा अमेरिका चीन है! 
भारत में विश्व की 2.42% भूमि है परंतु यहां 17.5% जनसंख्या निवास करती है! 
Note- भारत विश्व के क्षेत्रफल का 0.57% है परंतु कुल जमीनी क्षेत्रफल का 2.42% है! 
2011 की जनगणना के अनुसार भारत जनसंख्या की दृष्टि में दूसरे नंबर का देश है प्रथम स्थान चीन का है! 
Note- भारत विश्व का दसवां औद्योगिक देश है तथा छटा ऐसा देश है जो अंतरिक्ष में गया है! 
भारत के संपूर्ण क्षेत्रफल में 10.7% भाग पर्वत 18.6% भाग पहाड़ वह 27.7% भाग पठारी एवं 43% भाग मैदान है! 

भारत  7 देशों से स्थलीय सीमा बनाता है इसके के उत्तर में नेपाल भूटान (सबसे छोटा पड़ोसी देश) और चीन दक्षिण में श्रीलंका मालदीव एवं हिंद महासागर, पूर्व में बांग्लादेश म्यांमार बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में पाकिस्तान अरब सागर है! 
Note- भारत की सबसे लंबी स्थलीय सीमा बांग्लादेश (4096 किलोमीटर) , चीन (3488 किलोमीटर) पाकिस्तान (3323 किलोमीटर) तथा सबसे कम सीमा अफगानिस्तान से (106 किलोमीटर) साझा करता है! 
भारत की जलीय सीमा 7 देशों से लगी है पाकिस्तान मालदीप श्रीलंका बांग्लादेश म्यांमार  थाईलैंड इंडोनेशिया! 
Note- भारत की सबसे लंबी जलीय सीमा वाला राज्य गुजरात और सबसे छोटी जलीय सीमा वाला राज्य गोवा है! 
बांग्लादेश म्यांमार पाकिस्तान भारत की जलीय तथा स्थलीय दोनों सीमा से लगे देश हैं! 
भारत के 3 राज्यों की सीमाएं सर्वाधिक देशों से मिलती है- पश्चिम बंगाल (बांग्लादेश नेपाल भूटान) सिक्किम (नेपाल चीन भूटान) व  अरुणाचल प्रदेश (भूटान चीन म्यांमार) 
भारत को श्रीलंका से अलग करने वाला समुद्री क्षेत्र मन्नार की खाड़ी तथा पाक जलडमरूजलडमरू है! 

भारत के सीमावर्ती देश- 
बांग्लादेश (4996.7km)- पश्चिम बंगाल( बांग्लादेश से सबसे लंबी सीमा वाला राज्य)असम मेघालय त्रिपुरा मिजोरम
चीन (3448 km)- लद्दाख( चीन से लगी सबसे लंबी सीमा वाला राज्य) हिमाचल प्रदेश उत्तराखंड सिक्किम अरुणाचल प्रदेश
पाकिस्तान (3323km)- गुजरात राजस्थान (पाकिस्तान से सबसे लंबी सीमा वाला राज्य) पंजाब जम्मू कश्मीर और लद्दाख
नेपाल (1751km)- उत्तर प्रदेश बिहार उत्तराखंड पश्चिम बंगाल सिक्किम
म्यांमार (1643km)- असम (भूटान से सबसे लंबी सीमा वाला राज्य) सिक्किम पश्चिम बंगाल अरुणाचल प्रदेश
अफगानिस्तान भारत से 106 किलोमीटर सीमा बनाता है जो लद्दाख से लगती है यह पाक अधिकृत इलाका है! 

भारत के चारों और अंतिम सीमा बिंदु-
दक्षिणी बिंदु- इंदिरा प्वाइंट (ग्रेट निकोबार दीप) 
उत्तरी बिंदु- इंदिरा कॉल (लद्दाख) 
पश्चिमी बिंदु- गुहार मोती (गुजरात) 
पूर्व बिंदु- किबिधु (अरुणाचल प्रदेश) 
Note-मुख्य भूमि का दक्षिणतम बिंदु कन्याकुमारी तमिलनाडु इसे कैप कामोरिन भी कहा जाता है! 
कर्क रेखा भारत के 8 राज्यों से गुजरती है- गुजरात राजस्थान मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ झारखंड पश्चिम बंगाल त्रिपुरा मिजोरम
भारत का मानक समय(IST) इलाहाबाद प्रयागराज के निकट नैनी से गुजरने वाली 82.5 पूर्वी देशांतर रेखा को माना जाता है! जो ग्रीनविच समय(GMT) से 5 घंटे 30 मिनट आगे हैं! यह पांच राज्यों से गुजरती है! 
नोट-भारतीय उपमहाद्वीप में सम्मिलित देश भारत पाकिस्तान बांग्लादेश नेपाल भूटान है! 
तेलंगाना का गठन 2 जून 2014 को हुआ! 
भारत का क्षेत्रफल की दृष्टि में सबसे बड़ा राज्य राजस्थान और सबसे छोटा राज्य गोवा है! 
क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा जिला कच्छ उसके बाद लेह तथा जैसलमेर है! 
जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश और सबसे छोटा सिक्किम है! 
क्षेत्रफल की दृष्टि में अंडमान निकोबार दीप समूह सबसे बड़ा तथा लक्ष्यदीप सबसे छोटा संघ शासित प्रदेश है! 
केंद्र शासित प्रदेश पांडुचेरी का पहला भारत के 3 राज्यों में है तमिलनाडु में कराईकल , आंध्र प्रदेश में यमन व केरल में माहे! 
जनसंख्या की दृष्टि में सबसे बड़ा संघ शासित प्रदेश दिल्ली व सबसे कम जनसंख्या वाला संघ शासित प्रदेश लक्षद्वीप है! 
भारत की प्रदेशिक समुद्री सीमा तटरेखा से 12 समुद्री मील की दूरी तक है यहां भारत को संपूर्ण अधिकार प्राप्त है तटरेखा से 24 समुद्री मील की दूरी तक को संलग्न क्षेत्र  कहते हैं इस चित्र में भारत को राजकोषीय अधिकार सीमा शुल्क से संबंधित अधिकार प्रदूषण नियंत्रण तथा अप्रवासी कानून लागू करने का अधिकार है! अनन्य आर्थिक क्षेत्र तटरेखा से 200 समुद्री मील की दूरी तक है! 
सर क्रीक भारत पाकिस्तान सीमा का विवाद हिस्सा है जो गुजरात के कच्छ के रन में स्थित है! 
नोट- भारत के स्थलाकृति मानचित्र का निर्माण भारतीय सर्वेक्षण विभाग करता है इसकी स्थापना 1767 में हुई थी! 
महत्वपूर्ण- भारत और अफगानिस्तान के बीच डूरंड रेखा है जो 1893 में निर्धारित की गई थी भारत और चीन के बीच मैकमोहन रेखा है जो 1914 ईस्वी में शिमला अभीसमय के तहत निर्धारित की गई थी भारत और पाकिस्तान के बीच रेडक्लिफ रेखा है जिसका निर्धारण 1947 में निर्धारित किया गया बांग्लादेश के आजाद होने के बाद भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा रेखा को भी रेडक्लिप के नाम से जाना जाता है! 


Friday, January 28, 2022

उत्तराखंड में चंद्र वंश का उदय

                   उत्तराखंड में चंद्र वंश
एटकिंसन और बद्री दत्त पांडे इस वंश का संस्थापक सोमचंद्र को मानते हैं परंतु फ्रेजर साहब यशवंत सिंह कटोच इस वंश का संस्थापक थोहरचंद्र को मानते हैं! 
सोम चंद- यह मुलरूप से इलाहाबाद के निकट झुसी या प्रतिस्थानपुर नामक स्थान से लगभग 685 ईसवी या 700 ईसवी में कुमाऊ आया! इसका विवाह कत्यूरी शासक ब्रह्मा देव की पुत्री चंपा से हुआ दहेज में इसे चंपावत क्षेत्र में 300 नाली जमीन मिली जहां इसने चंद्र वंश की नींव रखी! 
दहेज की जमीन में इसने अंडाकार राजबुंगा का किला बनाया था! 
सोमचंद एक मांडलिक राजा था जो जयदेवमल डोडी को कर देता था! 
इसने किले की सुरक्षा के लिए चाराल या चारखाम व्यवस्था लागू की और कार्की चौधरी बोरा तड़ागी को  राजकार्य हेतु  नियुक्त किया! 
मेहरा व फर्त्याल लोगों से अच्छे संबंध स्थापित करने के लिए इन्हें उच्च पद दिए और इनकी मदद से कुमाऊं में पंचायती राज व्यवस्था की नींव रखी है! 
चोथानी ब्राह्मणों की नियुक्ति की जिसमें जोशी बिष्ट पांडे सिमल्टीया आते थे! 
इसका पहला अभियान खस राजा  के विरुद्ध था जिसमें इसका सेनापति कालू तड़ागी था इस मे इसकी  प्रथम विजय हुई! 
कुमाऊनी ऐपण कला का उदय सोमचंद ने ही कराया था! 
केपी नौटियाल के अनुसार संसद ने जागेश्वर में कई मंदिरों का निर्माण कराया था! 
सोमचंद ने पुलिस व्यवस्था व टैक्स व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए बुंढो और सयानो की नियुक्ति की! 
721 ईसवी में इसका निधन हो गया! 
इसके बाद आत्मचंद्र पूर्णचंद्र राजा बने जो अयोग्य राजा सिद्धू हुए! 
राजा इंद्रचंद- इसका शासनकाल 758 ईस्वी से 778 ईसवी का था!  यह तिब्बत से नेपाल की मदद से रेशम कीटो को लाया और यहां रेशम कारखाने खोलें! इसके समय पटरंगवाली झूठी खबरें सुर्खियों में थी! 
Note- पटरंगवाली खबर के विषय में ऐसी चर्चा थी इन खबरों से रेशम रगंते समय रंग पक्का होता था! 
राजा वीणाचंद- इसका शासनकाल 856 से 869 ईसवी तक का था यह एक विलासी राजा था संतान ना होने के कारण इस पर खसो ने आक्रमण किया और 200 साल तक शासन किया! 
वीरचंद- यह संसार चंद्र का वंशज था जो नेपाल में रहता था सौनखडायत की मदत सौपाल नामक खस राजा को हराकर उत्तराखंड में पुनः चंद्र वंश की नींव रखी! 
राजा नानकोंचंद- इसका शासनकाल 1177 से 1195 तक का था  गोपेश्वर के त्रिशूल लेख से पता चलता है कि इस के समय में 1191 में अशोक चल्ल का यहां आधिपत्य था! 
सहणपाल व  पुरुषोत्तम बोधगया शिलालेखों में इसे खस देश का राजा अधिराज कहा गया! 
बलकेश्वर मंदिर चंपावत का लेख 1223 में अशोक चल्ल व क्राचल्लदेव नामक राजाओं के नाम उल्लेखित है! 

थोहरचंद- कुछ इतिहासकार इसे चंद्र वंश का संस्थापक मानते हैं परंतु वह 23 वें नंबर का राजा था! राजा अभयचंद के गढ़ सारा कुट ताम्रपत्र में  उसे थोरहत अभयचंद कहा गया है! यह ताम्रपत्र लोहाघाट में है! 

त्रिलोकचंद- इसका शासनकाल 1296 से 1303 ईसवी तक था इसने छकाता अर्थात नैनीताल पर आक्रमण किया और भीमताल में एक किला बनाया इसने पाली,बारामंडल क्षेत्र को भी विजित किया था  इसके बाद डमरु चंद्र धर्म चंद्र अभय चंद्र गद्दी में बैठे जिनका अधिक विवरण प्राप्त नहीं है! 
अभयचंद- चंद्र वंश का प्रथम शासक जिसका वर्णन अभिलेखों में मिलता है इसके चार अभिलेख प्राप्त हुए हैं मानेसर मंदिर भीतरी शिलालेख, वालकेश्वर मंदिर लघु स्तंभ लेख, गढ़ सारी ताम्रपत्र, चौकुनी बोरा शिलालेख है! इसका शासनकाल 1344 से 1374 तक था! 
गरुण ज्ञानचंद- दिसंबर 1378 में अभय चंद की मृत्यु के बाद ज्ञान चंद्र प्रथम जिसे गुरु ज्ञानचंद के नाम से भी जानते हैं वह गद्दी में बैठा!  इस के दरबार में नीलू कठायत व  जस्सा कमलेखी थे!  ज्ञान चंद ने नीलू कठायत को रौत भुमि दी थी! परंतु जस्ता कमलेखी के  बहकावे में ज्ञान चंद्र नीलू कठायत को मरवा देता है! नीलू कठायत को कुमय्या खिल्लत भी कहा जाता है! ज्ञान चंद्र को गरुण की उपाधि फिरोजशाह तुगलक ने दी थी!  1591 के ताम्रपत्र से पता चलता है कि यह प्रथम चंद शासक था जिसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी! 
उधान चंद या ध्यानचंद- इसका शासनकाल 1420 से 1422 तक था इतने चंपावत के बालेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था जिसे बाद में विक्रम चंद्र ने कराया इस मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार 1796 में गोरखा  सूबेदार महावीर थापा ने कराया! 
विक्रम चंद- इसने गुजराती ब्राह्मणों को भी भूमि दान की तथा बालेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया! इसके समय माल क्षेत्र में सुल्तान मुबारक शाह की सेना द्वारा आक्रमण किया गया था! इसके समय जनता ने विद्रोह किया था! 
भारती चंद- विक्रम चंद्र के बाद कली कल्याण चंद गद्दी में बैठता है जिसका काफी विद्रोह होता है इसी विद्रोह का फायदा उठाकर भारती चंद्र गद्दी प्राप्त करता है! इतने डोडी की अधीनता स्वीकार नहीं की और इन से 12 वर्ष तक युद्ध किया और नायक जाति का उद्भव हुआ इस समय डोडी का राजा नाग माल था! डोडी अभियान में भारती चंद  के पुत्र रतन चंद्र का बहुत बड़ा हाथ इसी के कारण इस अभियान को सफल बनाया गया! भारती चंद  ने अपनी सेना में सभी को भर्ती किया इसने अपना पड़ाव देव सिंह मैदान में लगाया था जिसके साथ कटकु नौला में हैं! 
रतनचंद- जैंदा किराल की मदद से इसने उत्तराखंड में सोर क्षेत्र में  भूमि बंदोबस्त कराया जो उत्तराखंड का प्रथम बंदोबस्त था! 
कीर्ति चंद- यह नाथ संप्रदाय का अनुयाई था और पहला शासक था जिसने गढ़वाल पर आक्रमण किया इस समय गढ़वाल का राजा अजय पाल था गढ़वाल और कुमाऊं की सीमा को देवघाट निर्धारित किया! 
इसके बाद प्रताप चंद्र तारा चंद मानिकचंद कल्याण चंद्र तथा पूर्ण चंद्र राजा बने! 
मानिकचंद ने इस्लाम खां के विरोधी खवास खां को शरण दी थी! 
भीष्मचंद- यह चंद वंश का 43वे नंबर का  का राजा था! इसका शासनकाल 1511 से 1533 ईस्वी तक रहा यह अंतिम शासक था जिसने चंपावत से शासन किया था!  इसने अल्मोड़ा की स्थापना की और इसका नाम आलमनगर रखा यहां खगमराकोट का किला बनाया परंतु वह यहां से शासन नहीं कर पाया उसने अपनी राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा बनाए जिसका लाभ उठाकर रामगढ़ के गणपति गुजवा ने इसे मार कर बारामंडल पर अधिकार कर लिया! इस समय इसका गोद लिया हुआ पुत्र बालोकल्याण चंद  डोडी अभियान में था वह वहां संधि कर यहां आता है और गुजवा मारता है! 
बालोकल्याण चंद- यह अल्मोड़ा में शासन करने वाला पहला शासक था! इतने गंगोलीहाट पर भी अपना अधिकार प्राप्त किया!
इसका विवाह डोडी  के राजा हरि मल की बहन से हुआ और दहेज में सोर क्षेत्र मिला! परंतु इसे सिरा क्षेत्र चाहिए था! 
सिरा को प्राप्त करने के लिए  इसने उस पर आक्रमण किया परंतु यह सफल रहा इसने दानपुर क्षेत्र को भी जीता था!  इसके बाद इसका पुत्र रुद्रचंद  गद्दी में बैठता है
Note- इतने अल्मोड़ा में लाल मंडी का किला तथा मल्ला महल का निर्माण कराया था परंतु कुछ इतिहासकार मल्ला महल का निर्माणकर्ता रुद्रचंद को मानते है! 

राजा रुद्रचंद- यह अकबर के समकालीन था इसने नागौर की लड़ाई में अकबर का साथ दिया था इसकी बहादुरी देखकर अकबर ने इसे 84माल दे दिया था! 
इसका बीरबल से भी अच्छा संबंध था इसने बीरबल को अपना पुरोहित बनाया था! 
इसने पुरुष पंत  के सहयोग से डोडी के रैका राजा हरिमल्ल को हराया था परंतु बधाणगढी के  युद्ध में गढ़वाल नरेश बलभद्र साह के साथ युद्ध करते समय पुरुष पंत मारा जाता है! 
इतने रुद्रपुर  की स्थापना व मल्ला महल का निर्माण कराया था  एवं 1593 में रामशिला मंदिर का निर्माण करें तथा संस्कृति के प्रचार-पसार किया एवं अल्मोड़ा में संस्कृत शिक्षा की व्यवस्था की युवाओं को संस्कृत सीखने के लिए काशी तथा कश्मीर भेजा! 
इसने त्रैवर्णिक धर्मनिर्णय, श्येनिकशास्त्र, ययाति चरित्रम्, यथा ऊषिरागोदय चार ग्रंथ लिखे! 
इतने चौथानी ब्राह्मणों के नीचे भी ब्राह्मण वर्ग बनाएं- पंचबिडिये(तिथानी) ब्राह्मण, हलिया ब्राह्मण(पितलिये) ओली ब्राह्मण! 
लक्ष्मीचंद- राजा रुद्रचंद  के बाद उसका बेटा लक्ष्मीचंद गद्दी में बैठता है जिसे मानोदय काव्य  लक्ष्मण चंद कहा है! 
इसके मुगलों से अच्छे संबंध थे जिस कारण  जहांगीर की आत्मकथा में से पहाड़ी राजाओं में सबसे अमीर राजा बताया गया! 
गढ़वाल नरेश मानशाह के साथ सात युद्ध हारने के बाद आठवे युद्ध में अपने सेनापति गैंडा सिह साथ उतरता है! इस युद्ध को यह जीत जाते है और मानशाह के सेनापति खतडसिह को मार देते है! कुछ लोगों का मत है तब से कुमाऊं में खतड़वा त्यौहार मनाया जाता है
लक्ष्मीचंद के गढ को  गीदड़ गढ़ तथा इसे लखुली बिरालो कहते थे! 
इसने न्योवली और बिष्टावाली नामक कचहरिया बनाई थी! 1602 में इसने बागनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था
इसने कई बाग बगीचों का निर्माण कराया था तथा ज्यूलिया व सिरती नामक कर भी लगाए थे! लोक मान्यता के अनुसार इसके समय करो का भार इतना था कि लोग सब्जियां अपनी छत पर उगाते थे! 
इसने प्रशासन को तीन भागों में बांटा था-
सरदार- परगने का अधिकारी.
फौजदार- सेना का अधिकारी
नेगी(दस्तुर) - राज्य के छोटे कर्मचारी
लक्ष्मीचंद के भाई का नाम शक्ति गोसाई था जो जन्म से अंधा था इसे कुमाऊ का धृतराष्ट्र कहा जाता है यह प्रशासनिक व्यवस्था देखता था! 

लक्ष्मी चंद के बेटे दीपचंद त्रिमलचंद नारायण चंद नीलू गोसाईं थे! 
राजा दिलीप चंद- इसका शासनकाल 1621 से 1624 तक था यह लक्ष्मीचंद का पुत्र था टीवी के कारण उसकी मृत्यु हो जाती है! 
राजा विजय चंद- यह दिलीप चंद का बेटा था इस के शासन में शंकर कार्की पीरु गोसाई विनायक भट्ट का हस्तक्षेप  था! 
विजय चंद के चाचा ने इन तीनों का विरोध किया जिस कारण इन्होंने इसकी आंखें निकाल दी जिससे इसके कुछ समय बाद इसकी मृत्यु हो जाती है इसके बेटे को पुरोहित श्री धर्माकर तिवारी जी पालते हैं!  जो बाद में बाज बहादुर चंद्र के नाम से राजा बनता है! 
नीलू गोसाई की मृत्यु के बाद यह तीनों राजा विजयचंद को भी मार देते हैं! भय  के कारण  लक्ष्मी चंद के बेटे त्रिमल चंद गढ़वाल नरेश श्याम शाह की शरण लेता है और श्याम शाह एवं मेहरा दल की मदद से कुमाऊ की गद्दी प्राप्त करता है! 
त्रिमलचंद शंकर कार्की को मार देता है और विनायक भट्ट की आंखें निकाल देता है पीरु गोसाई भय के कारण आत्महत्या कर लेता है! 
 यह नीलू कठआयत के खानदान के एक व्यक्ति कर्ण कठआयत को रसोईया दरोगा बनाता है! 
त्रिमलचंद की 1630 में जागेश्वर में मूर्ति स्थापित की थी! 
इसके समय छखाता में विद्रोह हुआ था इतने महिपतिशाह के साथ भी युद्ध किया था! 

बाजबहादुर चंद- यह नीलू गुसाई का पुत्र था इसे धर्माकर तिवारी जी ने पाला! इसका मूल नाम बाजा था राजा बनने से पूर्व यहां ग्वाले का जीवन जीता था!  
जब शाहजहां ने गढ़वाल पर आक्रमण किया इसने उसकी मदद की थी जिस कारण इसे उसने बहादुर की उपाधि दी! 
इसके के निर्माण कार्य-
कटारमल सूर्य मंदिर का जीर्णोद्धार 
भीमेश्वर मंदिर का निर्माण( भीमताल) 
एक हथिया देवास( पिथौरागढ़) 
पिननाथ मंदिर (बागेश्वर) का निर्माण 
घोड़ाखाल का गोलज्यु मंदिर
नंदा देवी की मूर्ति देवलगढ़ से अल्मोड़ा लाया था
इसके समकालीन गढ़वाली राजा-पृथ्वीपति शाह फतेहपतिशाह
इसके अन्य कार्य-
बाजपुर नगर की स्थापना! 
1639 इसके एक अधिकारी काशीनाथ ने काशीपुर के स्थापना! 
किसने प्रति परिवार से ₹1 कर लगाया था जो जजिया कर या पौल कर के समान था! 
बेकार पर रोक लगाने वाला पहला शासक था! 
कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए गूंठ भूमि दान(1673) की थी! 
इतने मांगा नामक कर भी लगाया था! 
यह पहला शासक था जिसका चित्र प्राप्त हुआ! 
इसने भोटिया व शौका व्यापारियों ने सिरती नामक कर लगाया था! 
इसके समकालीन तीलू रौतेली थी इसे गढ़वाल की झांसी की रानी व  गढ़वाल की जॉन आफ आर्क भी कहते हैं इसे रामू रजवार ने  पूर्वी नयाल नदी तट मारा था! इसकी घोड़े का नाम बिंदुली था! 
Note- अनंतदेव ने बाज बहादुर चंद के संरक्षण में
स्मृति कौस्तुभ नामक ग्रंथ लिखा! 
उधोतचंद- इसका शासनकाल 1678 से 1698 तक था! 1678 मैं इसने गढ़वाल पर आक्रमण कर बधानगढ को जीता परन्तु इस  युद्ध में इसका सेनापति मेसी साहू मारा जाता है! 
इसने डोडी के राजा देवपाल को हराया था  उनके बीच खैरागढ़ की संधि हुई अब डोडी कुमाऊं को कर देगा इस समय इसका सेनापति हेरू देउबा था! इस संधि के बाद इसने अल्मोड़ा में त्रिपुरी सुंदरी मंदिर सोमेश्वर महादेव मंदिर पार्वतीईश्वर मंदिर शुक्रेश्वर मंदिर उधोतमंदिर बनाया! 
खैरागढ़ की संधि को डोडी के राजा  कुछ समय बाद नहीं मानते और कुमाऊं पर आक्रमण करते हैं इस आक्रमण में  उधोतचंद का सेनापति शिरोमणि जोशी मारा जाता है! 
इसके अन्य कार्य-
इसने 1689 में तल्ला महल बनाया था! इसी वर्ष इसने एक लाख दीपक जलाकर देवताओं की पूजा की थी इसको ही लक्ष्य दीपावली कहा जाता है! 
किसके समय में शाहू महाराज के राज कवि मतिराम अल्मोड़ा दरबार में आए थे! 
इतने काशीपुर में आम के बगीचे लगाए जिसे अब नागनसती बाग  कहा जाता हैं! 
पंडित रुद्र दत्त पंत ने इसे तपस्वी राजा कहा है क्योंकि इस के दरबार में काफी ज्योतिष व विद्वान थे और इसने अंतिम समय में शांति की खोज में लग गया! 
ज्ञानचंद- यह 1698-1708 तक राजा बना  इसका पहला अभियान पिंडर घाटी में हुआ इसी वर्ष इतने बधाणगढ़ को लूटा! और यहां से नंदा देवी की स्वर्ण मूर्ति लाया और इसे नंदा देवी मंदिर में स्थापित किया 1703 में दूधौली के युद्ध में ज्ञान चंद्र ने फ़तेह पति साह को हराया! 
इसने  कत्यूरी में बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण तथा बैजनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया! 


जगत चंद- इसका समय काल  1708 से 1720 तक था 1709 में गढ़वाल नरेश फ़तेहपतीसाह को हराकर श्रीनगर जीता! 
इसके संबंध मुगल सम्राट बहादुरशाह से बहुत अच्छे थे! 
यह पहला शासक था जिसने जुआरियों पर कर लगाया था! 
इसके काल को कुमाऊं में चंद्रवंश का स्वर्ण काल कहा जाता है! 
इसकी मृत्यु चेचक के कारण हुई थी! 

राजा देवी चंद-
इसके समय गैडा बिष्ट , मानिक बिष्ट, पूरनमल का  हस्तक्षेप था  जो इसके सलाहकार थे इन्होंने इसके मन में विक्रमादित्य बनाने की जिज्ञासा को जगाया जिसके कारण इसने हवालबाग में चीड़ के वृक्ष को वस्त्रों से ठगा श्रीनगर जीत ना आने के कारण हवालबाग की पहाड़ी में श्रीनगर बनायाl
नोट- 1773 का रचुलाघाट का युद्ध प्रदीप शाह  से जीता था परंतु गणाई का युद्ध प्रदीप साह से हार गया
दिल्ली का बादशाह का सेनापति/शहजादा साबिरशाह दिल्ली से भागकर इस के दरबार में आया अपने सेनापति दाऊदखां के साथ इस ने दिल्ली पर आक्रमण किया और असफल रहा
इसके पागलपंथी कार्यों के लिए एटकिंसन व रुद्र पंत ने इसी मोहम्मद बिन तुगलक कहा l
पूरनमल, गैडा बिष्ट मानिक बिष्ट इसकी हत्या कर दी उसके बाद राजा अजीत चंद बना l

अजीत चंद- इस के समय में पूरनमल मानिकचंद गैडा बिष्ट का हस्तक्षेप काफी अधिक था जिस कारण इसके काल को गैडा गैर्द्दी के नाम से जाना जाता है l
पुरनमल का संबंध उसकी पत्नी से था जिससे यह गर्भवती हो जाती है l  इसका पता अजीत चंद को पता लगता है और यह तीनों उसे मरवा देते हैं इसके बाद यह ज्ञानचंद के दमाद अजीत सिंह को गद्दी में बैठ आते हैं जो गद्दी में अजीत चंद के नाम से बैठता है परंतु इसका समय बहुत कम होता है उसके बाद अजीत चंद का नाजायज नवजात बेटा वाला कल्याण चंद गद्दी में बैठता है इसका जनता विद्रोह करती हैl
इसके बाद लक्ष्मीचंद के पुत्र नारायण चंद्र का वंशज कल्याण चंद पंचम्  गद्दी में बैठता है! 

कल्याण चंद पंचम- इसे डोटी से अनूप सिंह त्यागी हीरा चौधरी और लक्ष्मण चौधरी लाए और कुमाऊं का राजा बनाय
यह एक अनपढ़ शासक था जिसका शासन का 1729 से 1747 तक था! यह पूरणमल मानिकचंद गैडा बिष्ट को मार देता है! 
1743-44 मैं रोहिल नेता अली मोहम्मद खान ने अपने तीन सेनापति हाफिज रहमतखां, पैंदाखां, सरदार खां, के नेतृत्व में कुमाऊं में आक्रमण किया इस युद्ध में कल्याण चंद की मदद  गढ़वाल नरेद प्रदीप शाह ने की थी इस युद्ध को दूनागिरी का युद्ध में कहते हैं! इसमें रोहिल  विजेता रहे! 
रोहिलो दूसरा युद्ध 1745 में हुआ  इसमें इनका नेतृत्व नजीब खां कर रहा था  परंतु इस समय कुमाऊँ सेना का नेतृत्व शिवदत्त जोशी कर रहा था! इस युद्ध में कुमाऊं की विजय हुई! 
Imp- 
राजा कल्याणचंद के दरबार में कभी शिवदत्त थे जिन्होंने कल्याणचंद्रोदय की रचना की थी! 
इसने चोमहला महल का निर्माण कराया! 
शिवदत्त जोशी को कुमाऊ का बैरन खा कहा जाता है! 

दीपचंद- इस के समय में प्लासी का युद्ध पानीपत का युद्ध बक्सर का युद्ध हुआ था!  इसका संरक्षक शिवदत्त जोशी था! 
हैमिल्टन ने इसे गूंगा शासक कहा! 
इसी के समय मे  काशीपुर में फर्त्याल दल ने शिवदत्त जोशी को घेर कर मार दिया! 
इसकी पत्नी श्रृंगार मंजरी के संबंध परमानंद बिष्ट से थे  यह अपने भाई मोहन सिंह रौतेला को दीवान बनाना चाहती थी मोहन सिंह रौतेला ने सबसे पहले देव जोशी और उसके दो पुत्रों को सिरा कोर्ट के किले में 1777 में मरा दीया उसके बाद परमानंद श्रृंगार मंजरी जय कृष्ण जोशी( शिवदत्त  जोशी का पुत्र)  को भी मरवा दिया और हर्ष देव जोशी (शिवदत्त जोशी का पुत्र)  को बंदी बना लिया! और स्वयं राजा बन गया! 

राजा मोहन चंद- मोहन सिंह रौतेला 1777 मैं राजा मोहन चंद के नाम से गद्दी में बैठता है और 1779 तक शासन करता है इसी बीच हर्ष देव जोशी इसकी कैद से भागकर गढ़वाल नरेश ललिताशाह की मदद से इसे हर आता है और इस युद्ध में ललित शाह का नेतृत्व इसका सेनापति प्रेम चंद्र खंडूरी कर रहा होता है जो हर्ष देव जोशी की मदद से मोहनचंद को हराता है! मोहन चंद कुमाऊ से भाग जाता है! 

राजा प्रधुम्नशाह/प्रधुम्नचंद- ललित शाह का पुत्र प्रधुम्न साह  कुमाऊ के गद्दे में दीपचंद्र के गोद लिए हुए बेटे प्रदुम्न चंद के नाम से गद्दी में बैठते हैं! और कुछ समय बाद गढ़वाल में इसका भाई जय कृति शाह आत्महत्या कर लेता है और यह गढ़वाल में राजा बन जाता है कुमाऊ की गद्दी हर्ष देव जोशी को छोड़ जाता हैं! 
अतः एकमात्र शासक जो गढ़वाल व कुमाऊं में राजा बनता है! 
इस का लाभ उठाकर मोहन चंद फिर से कुमाऊं में आक्रमण करता है इस युद्ध में प्रधुम्न शाह का भाई पराक्रम शाह मोहनचंद की मदद करता है! इस युद्ध को पाली गांव का युद्ध कहते हैं इस युद्ध में मोहन चंद लाल सिंह पराक्रम शाह  एक साथ तथा हर्ष देव जोशी व प्रधुम्न शाह  एक और होते हैं इस युद्ध में हर्ष देव जोशी की हार होती है! 

मोहनचंद- मोहन चंद पहला शासक होता है जो कुमाऊ की गद्दी में दो बार शासन करता है! परंतु यह शासन 1786 से 1788 तक चलता है इस बीच हर्ष देव जोशी मोहन चंद और उसके पुत्र विशन सिंह को मार देता है! 

शिवचंद- हर्षित देव जोशी की मदद से शिवचंद राजा बनता है इसे मिट्टी का महादेव भी कहा जाता है क्योंकि इसके समय में हर्ष देव जोशी का पूर्ण हस्तक्षेप होता है लाल सिंह अपने भतीजे महेंद्र चंद्र के साथ कुमाऊं में आक्रमण करता है और इन्हें हरा देता है! 

महेन्द्र चंद- लाल सिंह स्वयं गद्दी में ना बैठ कर अपने भतीजे महेंद्र चंद्र को गद्दी में बैठा था जो इसके भाई मोहन चंद का पुत्र होता है! 
हर्ष देव जोशी पुनः गढ़वाल जाता है परंतु इसे कोई मदद नहीं मिलती फिर यह नेपाल से मदद लेता है और महेंद्र चंद पर आक्रमण करता है! 
1790 में गोरखाओं का कुमाऊं में  आक्रमण होता है और इस युद्ध में महेंद्र चंद्र की हार होती है!  और कुमाऊं में गोरखा वंश की नींव रखी जाती है!  
अतः महेंद्र चंद अंतिम चंद राजा था! 


संधि

                    संधि और उसके प्रकार
संधि-जब तो समीपवर्ती वर्णों के मेल से जो विकार या परिवर्तन होता है  उसे संधि कहते हैं यह तीन प्रकार की होती है स्वर संधि व्यंजन संधि विसर्ग संधि

स्वर संधि की परिभाषा

जब दो स्वर आपस में जुड़ते हैं या दो स्वरों के मिलने से उनमें जो परिवर्तन आता है, तो वह स्वर संधि कहलाती है। जैसे :

  • विद्यालय : विद्या + आलय 

इस उदाहरण में आप देख सकते है कि जब दो स्वरों को मिलाया गया तो मुख्य शब्द में हमें अंतर देखने को मिला। दो आ मिले एवं उनमे से एक आ का लोप हो गया।

  • पर्यावरण : परी + आवरण 

ऊपर दिए गए उदाहरण में जैसा कि आपने देखा दो स्वरों को मिलाया गया एवं उससे वाक्य में परिवर्तन आया। ई एवं आ को मिलाने से या बन गया।

  • मुनींद्र : मुनि + इंद्र 

ऊपर दिए गए उदाहरण में आप देख सकते हैं इ एवं इ दो स्वरों को मिलाया गया। जब दो इ मिलीं तो एक ई बन गयी। यह परिवर्तन हुआ।

स्वर संधि के प्रकार

स्वर संधि के मुख्यतः पांच भेद होते हैं:

  1. दीर्घ संधि
  2. गुण संधि
  3. वृद्धि संधि
  4. यण संधि
  5. अयादी संधि

1. दीर्घ संधि :

संधि करते समय अगर (अ, आ) के साथ (अ, आ) हो तो ‘आ‘ बनता है, जब (इ, ई) के साथ (इ , ई) हो तो ‘ई‘ बनता है, जब (उ, ऊ) के साथ (उ ,ऊ) हो तो ‘ऊ‘ बनता है। जब ऐसा होता है तो हम इसे दीर्घ संधि कहते है। इस संधि को ह्रस्व संधि भी कहा जाता है।

उदाहरण:

  • विद्या + अभ्यास : विद्याभ्यास (आ + अ = आ)
  • परम + अर्थ : परमार्थ (अ + अ = आ)
  • कवि + ईश्वर : कवीश्वर (इ + ई = ई)
  • गिरि + ईश : गिरीश (इ + ई = ई)
  • वधु + उत्सव : वधूत्सव (उ + उ = ऊ)

2. गुण संधि

जब संधि करते समय  (अ, आ) के साथ (इ , ई) हो तो ‘ए‘ बनता है, जब (अ ,आ)के साथ (उ , ऊ) हो तो ‘ओ‘ बनता है, जब (अ, आ) के साथ (ऋ) हो तो ‘अर‘ बनता है तो यह गुण संधि कहलाती है।

उदाहरण:

  • महा + उत्सव :  महोत्सव  (आ + उ = ओ)
  • आत्मा + उत्सर्ग : आत्मोत्सर्ग (आ + उ = ओ)
  • धन + उपार्जन : धनोपार्जन (अ + उ = ओ)
  • सुर + इंद्र : सुरेन्द्र  (अ + इ = ए)
  • महा + ऋषि : महर्षि (आ + ऋ = अर)

3. वृद्धि संधि

जब संधि करते समय जब अ , आ  के साथ  ए , ऐ  हो तो ‘ ऐ ‘ बनता है और जब अ , आ  के साथ ओ , औ हो तो ‘ औ ‘ बनता है। उसे वृधि संधि कहते हैं।

उदाहरण:

  • महा + ऐश्वर्य : महैश्वर्य (आ + ऐ = ऐ)
  • महा + ओजस्वी : महौजस्वी (आ + ओ = औ)
  • परम + औषध : परमौषध (अ + औ = औ)
  • जल + ओघ : जलौघ (अ + ओ = औ)
  • महा + औषध : महौषद (आ + औ = औ)

4. यण संधि

जब संधि करते समय इ, ई के साथ कोई अन्य स्वर हो तो ‘ य ‘ बन जाता है, जब उ, ऊ के साथ कोई अन्य स्वर हो तो ‘ व् ‘ बन जाता है , जब ऋ के साथ कोई अन्य स्वर हो तो ‘ र ‘ बन जाता है।

उदाहरण :

  • अति + अधिक : अत्यधिक (इ + अ = य)
  • प्रति + अक्ष : प्रत्यक्ष (इ + अ = य)
  • प्रति + आघात : प्रत्याघात (इ + आ = या)
  • अति + अंत : अत्यंत (इ + अ = य)
  • अति + आवश्यक : अत्यावश्यक (इ + आ = या)

5. अयादि संधि-जब संधि करते समय ए , ऐ , ओ , औ के साथ कोई अन्य स्वर हो तो (ए का अय), (ऐ का आय), (ओ का अव), (औ – आव) बन जाता है। यही अयादि संधि कहलाती है।

  • उदाहरण:

    • श्री + अन : श्रवण
    • पौ + अक : पावक
    • पौ + अन : पावन
    • नै + अक : नायक

                व्यंजन संधि 

व्यंजन संधि-जब संधि करते समय व्यंजन के साथ स्वर या कोई व्यंजन के मिलने से जो रूप में परिवर्तन होता है, उसे ही व्यंजन संधि कहते हैं।
  • यानी जब दो वर्णों में संधि होती है तो उनमे से पहला यदि व्यंजन होता है और दूसरा स्वर या व्यंजन होता है तो उसे हम व्यंजन संधि कहते हैं।

व्यंजन संधि के कुछ उदाहरण :

  • दिक् + अम्बर = दिगम्बर
  • अभी + सेक = अभिषेक
  • दिक् + गज = दिग्गज
  • जगत + ईश = जगदीश

व्यंजन संधि के नियम :

व्यंजन संधि के कुल 13 नियम होते हैं जो कि निम्न है :

नियम 1:

  • जब किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) का मिलन किसी वर्ग के तीसरे या चौथे वर्ण से या (य्, र्, ल्, व्, ह) से या किसी स्वर से हो जाये तो क् को ग् , च् को ज् , ट् को ड् , त् को द् , और प् को ब् में बदल दिया जाता है।
  • अगर व्यंजन से स्वर मिलता है तो जो स्वर की मात्रा होगी वो हलन्त वर्ण में लग जाएगी।
  • लेकिन अगर व्यंजन का मिलन होता है तो वे हलन्त ही रहेंगे।

उदाहरण :

  • क् का ग् में परिवर्तन :
    • वाक् +ईश : वागीश
    • दिक् + अम्बर : दिगम्बर
    • दिक् + गज : दिग्गज
  • ट् का ड् में परिवर्तन :
    • षट् + आनन : षडानन
    • षट् + यन्त्र : षड्यन्त्र
    • षड्दर्शन : षट् + दर्शन
  • त् का द् में परिवर्तन :
    •  सत् + आशय : सदाशय
    •  तत् + अनन्तर : तदनन्तर
    •  उत् + घाटन : उद्घाटन
  • प् का ब् में परिवर्तन :
    • अप् + ज : अब्ज
    • अप् + द : अब्द आदि।

नियम 2:

  • अगर किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) का मिलन न या म वर्ण ( ङ,ञ ज, ण, न, म) के साथ हो तो क् का ङ्, च् का ज्, ट् का ण्, त् का न्, तथा प् का म् में परिवर्तन हो जाता है।

उदाहरण :

  • क् का ङ् में परिवर्तन :
    • दिक् + मण्डल : दिङ्मण्डल
    • वाक् + मय  : वाङ्मय
    • प्राक् + मुख : प्राङ्मुख
  • ट् का ण् में परिवर्तन :
    • षट् + मूर्ति : षण्मूर्ति
    • षट् + मुख : षण्मुख
    • षट् + मास : षण्मास
  • त् का न् में परिवर्तन :
  • उत् + मूलन : उन्मूलन
  • उत् + नति :  उन्नति
  • जगत् + नाथ : जगन्नाथ
  • नियम 3-
  • जब त् का मिलन ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, व से या किसी स्वर से हो तो द् बन जाता है।
  • म के साथ क से म तक के किसी भी वर्ण के मिलन पर ‘ म ‘ की जगह पर मिलन वाले वर्ण का अंतिम नासिक वर्ण बन जायेगा।
  • उदाहरण :
  • म् का (क ख ग घ ङ) के साथ मिलन :
  • सम् + कल्प : संकल्प/सटड्ढन्ल्प
  • सम् + ख्या : संख्या
  • सम् + गम : संगम
  • शम् + कर : शंकर
  • म् का (च, छ, ज, झ, ञ) के साथ मिलन :
  • सम् + जीवन : संजीवन
  • सम् + चय : संचय
  • किम् + चित् : किंचित
  • म् का (ट, ठ, ड, ढ, ण) के साथ मिलन :
  • दम् + ड : दंड
  • खम् + ड : खंड
  • म् का (त, थ, द, ध, न) के साथ मिलन :
  • सम् + देह : सन्देह
  • सम् + तोष : सन्तोष
  • किम् + नर : किन्नर
  • म् का (प, फ, ब, भ, म) के साथ मिलन :
  • सम् + पूर्ण : सम्पूर्ण
  • सम् + भव : सम्भव
  • त् का (ग , घ , ध , द , ब , भ ,य , र , व्) के उदहारण :
  • जगत् + ईश : जगदीश
  • भगवत् + भक्ति : भगवद्भक्ति
  • तत् + रूप : तद्रूपत
  • सत् + भावना = सद्भावना
  • नियम 4 :
  • त् से परे च् या छ् होने पर च, ज् या झ् होने पर ज्, ट् या ठ् होने पर ट्, ड् या ढ् होने पर ड् और ल होने पर ल् बन जाता है।
  • म् के साथ (य, र, ल, व, श, ष, स, ह) में से किसी भी वर्ण का मिलन होने पर ‘म्’ की जगह पर अनुस्वार ही लगता है।
  • उदाहरण :

    • सम् + वत् : संवत्
    • तत् + टीका : तट्टीका
    • उत् + डयन : उड्डयन
    • सम् + शय : संशय

    नियम 5:

    • जब त् का मिलन अगर श् से हो तो त् को च् और श् को छ् में बदल दिया जाता है। जब त् या द् के साथ च या छ का मिलन होता है तो त् या द् की जगह पर च् बन जाता है।

    उदाहरण:

    • उत् + शिष्ट : उच्छिष्ट
    • शरत् + चन्द्र : शरच्चन्द्र
    • उत् + छिन्न : उच्छिन्न
    • उत् + चारण : उच्चारण

    नियम 6 :

    • जब त् का मिलन ह् से हो तो त् को द् और ह् को ध् में बदल दिया जाता है। त् या द् के साथ ज या झ का मिलन होता है तब त् या द् की जगह पर ज् बन जाता है।

    उदाहरण :

    • उत् + हरण : उद्धरण
    • तत् + हित : तद्धित
    • सत् + जन : सज्जन
    • जगत् + जीवन : जगज्जीवन
    • वृहत् + झंकार : वृहज्झंकार
    • उत् + हार : उद्धार

    नियम 7:

    • स्वर के बाद अगर छ् वर्ण आ जाए तो छ् से पहले च् वर्ण बढ़ा दिया जाता है।
    • त् या द् के साथ ट या ठ का मिलन होने पर त् या द् की जगह पर ट् बन जाता है।
    • जब त् या द् के साथ ‘ड’ या ढ की मिलन होने पर त् या द् की जगह पर‘ड्’बन जाता है।

    उदाहरण:

    • आ + छादन : आच्छादन
    • संधि + छेद : संधिच्छेद
    • तत् + टीका : तट्टीका
    • वृहत् + टीका : वृहट्टीका
    • भवत् + डमरू : भवड्डमरू
    • स्व + छंद : स्वच्छंद

    नियम 8:

    • अगर म् के बाद क् से लेकर म् तक कोई व्यंजन हो तो म् अनुस्वार में बदल जाता है।
    • त् या द् के साथ जब ल का मिलन होता है तब त् या द् की जगह पर ‘ल्’ बन जाता है।

    उदाहरण :

    • तत् + लीन = तल्लीन
    • विद्युत् + लेखा = विद्युल्लेखा
    • किम् + चित = किंचित
    • उत् + लास = उल्लास

    नियम 9 :

    • म के बाद य, र, ल, व, श, ष, स, ह में से कोई एक व्यंजन हो तो म् अनुस्वार में बदल जाता है।

    उदाहरण:

    • सम् + योग : संयोग
    • सम् + हार : संहार
    • सम् + वाद : संवाद
    • सम् + शय : संशय

    नियम 10 :

    ऋ, रू या थ्रू के बाद न तथा इनके बीच में चाहे स्वर, क वर्ग, प वर्ग , अनुश्वार , य व या ह आये तो न् का ण हो जाता है।

    उदाहरण :

    • भुष + अन : भूषण
    • प्र + मान : प्रमाण
    • राम + अयन : रामायण

    नियम 11 :

    • यदि किसी शब्द का पहला वर्ण स हो तथा उसके पहले अ या आ के अलावा कोई दूसरा स्वर आये तो स के स्थान पर ष हो जाता है।

    उदाहरण:

    • अनु + सरण : अनुसरण
    • सु + सुप्ति : सुषुप्ति
    • वि + सर्ग : विसर्ग
    • नि : सिद्ध : निषिद्ध

    नियम 12 :

    • यौगिक शब्दों के अंत में यदि प्रथम शब्द का अंतिम वर्ण न हो, तो उसका लोप हो जाता है।

    उदाहरण :

    • हस्तिन + दंत : हस्तिन्दंत
    • प्राणिन + मात्र : प्राणिमात्र
    • राजन + आज्ञा : राजाज्ञा

    नियम 13 :

    जब ष के बाद त या थ रहे तो त के बदले ट और थ के बदले ठ हो जाता है। जैसे-

    • उदाहरण:

      • शिष् + त : शिष्ट
      • पृष् + थ : पृष्ठ


     

                 विसर्ग संधि

    जब संधि करते समय  विसर्ग के बाद स्वर या व्यंजन वर्ण के आने से जो विकार उत्पन्न होता है, हम उसे विसर्ग संधि कहते हैं। जैसे:

    विसर्ग संधि के उदाहरण :

    • अंतः + करण : अन्तकरण
    • अंतः + गत : अंतर्गत
    • अंतः + ध्यान : अंतर्ध्यान
    • अंतः + राष्ट्रीय : अंतर्राष्ट्रीय

    विसर्ग संधि के नियम :

    नियम 1:

    अगर कभी शब्द में विसर्ग के बाद च या छ हो तो विसर्ग श हो जाता है। ट या ठ हो तो ष तथा त् या थ हो तो स् हो जाता है। जैसे:

    उदाहरण:

    • नि: + चल : निश्चल
    • धनु: + टकार : धनुष्टकार
    • नि: + तार : निस्तार

    नियम 2:

    अगर कभी संधि के समय विसर्ग के बाद श, ष या स आये तो विसर्ग अपने मूल रूप में बना रहता है या उसके स्थान पर बाद का वर्ण हो जाता है।

    उदाहरण : 

    • नि: + संदेह : निस्संदेह
    • दू: + शासन : दुशासन

    नियम 3:

    अगर संधि के समय विसर्ग के बाद क, ख या प, फ हों तो विसर्ग में कोई विकार नहीं होता।

    उदाहरण: 

    • रज: + कण : रज:कण
    • पय: + पान : पय:पान

    नियम 4:

    अगर संधि के समय विसर्ग से पहले ‘अ’ हो और बाद में घोष व्यंजन या ह हो तो विसर्ग ओ में बदल जाता है।

    उदाहरण :

    • मनः + भाव : मनोभाव
    • यशः + दा : यशोदा

    नियम 5:

    अगर संधि के समय विसर्ग से पहले अ या आ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तथा बाद में कोई घोष वर्ण हो तो विसर्ग के स्थान र आ जाता है। जैसे: 

    उदाहरण :

    • निः + गुण : निर्गुण
    • दु: + उपयोग : दुरूपयोग

    नियम 6:

    अगर संधि के समय विसर्ग के बाद त, श या स हो तोविसर्ग के बदले श या स् हो जाता है। जैसे: 

    उदाहरण :

    • निः + संतान :  निस्संतान
    • निः + तेज़ : निस्तेज
    • दु: + शाशन : दुश्शाशन

    नियम 7:

    अगर संधि करते समय विसर्ग से पहले अ या आ हो तथा उसके बाद कोई विभिन्न स्वर हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है एवं पास-पास आये हुए स्वरों की संधि नहीं होती। जैसे:

    उदाहरण:

    • अतः + एव : अतएव

    नियम 8:

    • अंत्य के बदले भी विसर्ग होता है। यदि के आगे अघोष वर्ण आवे तो विसर्ग का कोई विकार नहीं होता और यदि उनके आगे घोष वर्ण आ जाता है तो र ज्यों का त्यों रहता है। जैसे: 

    उदाहरण:

    • पुनर् + उक्ति : पुनरुक्ति
    • अंतर् + करण : अंतःकरण